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कोरोना के दौर में बिहार में शुरू हो गया चमकी बुखार का कहर, कौन बचाएगा इन बच्चों को | blog-acute-encephalitis-syndrome-cases-rises-in-bihar-during-covid-19-era | – News in Hindi

कोरोना संक्रमण (COVID-19) के खतरों के बीच बिहार में चमकी बुखार (AES) का प्रकोप शुरू हो गया है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अब तक पांच बच्चों की मौत इस बीमारी की वजह से हो चुकी है. इस वक्त भी राज्य के अलग-अलग अस्पतालों में इस रहस्यमय और जानलेवा बीमारी के 21 मरीज भर्ती हैं. यह मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है, क्योंकि अमूमन अप्रैल के महीने में इस बीमारी के इक्का-दुक्का केस आते रहे हैं. इसका असल प्रकोप मई महीने के दूसरे पखवाड़े से शुरू होता और पूरे जून महीने में चलता है, जबकि इस साल मार्च से ही बच्चों की मौत होने लगी है. राज्य में पहले से ही कम संसाधनों और छोटी टीम के साथ कोरोना से जूझ रहा स्वास्थ्य विभाग बच्चों के लिए जानलेवा इस बीमारी से कितना मुकाबला कर पायेगा, यह गंभीर सवाल है.

उत्तर बिहार के 11 जिलों में बच्चों के लिए जानलेवा साबित होने वाली यह बीमारी AES, जिसे स्थानीय भाषा में चमकी बुखार भी कहते हैं, हर साल गर्मियों में फैलती है और बड़ी संख्या में बच्चों की मौत हो जाती है. पिछले साल भी इस बीमारी से 600 से अधिक बच्चे पीड़ित हुए थे और इनमें 185 की मौत हो गई थी. उस वक्त इन बच्चों की मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया था. राज्य के स्वास्थ्य संसाधनों को लेकर तब बड़े सवाल उठे थे.

उस वक्त बीमार होने वाले बच्चों के सामाजिक आर्थिक स्थितियों का आकलन करने के लिए सरकार और स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा बीमार बच्चों के परिवार वालों का सर्वेक्षण किया गया था. सरकारी सर्वेक्षण तो सार्वजनिक नहीं हुआ, मगर सेंटर फॉर रिसर्च एंड डायलॉग द्वारा किए गए सर्वेक्षण से पता चला कि बीमार होने वाले बच्चों में से 95 फीसदी से अधिक अत्यंत गरीब और दलित-पिछड़ी जाति के बच्चे हैं. वे कुपोषण का शिकार हैं. उनमें से ज्यादातर का टीकाकरण नहीं हुआ है. 70 फीसदी से अधिक परिवार वालों में चमकी बुखार को लेकर जागरूकता न के बराबर है. उनके इलाकों में आंगनबाड़ी की स्थिति ठीक नहीं है. न उन्हें समुचित पोषाहार मिलता है, न ही उनका वजन और बांह का माप लिया जाता है.

सेंटर फॉर रिसर्च एंड डायलॉग के एक अन्य शोध में यह भी मालूम पड़ा कि चमकी बुखार से सर्वाधिक प्रभावित इलाकों में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की घोर कमी है. वहां के सरकारी अस्पतालों में 41 फीसदी मैनपावर ही मौजूद है. 88 स्वीकृत पदों की जगह सिर्फ 27 डॉक्टर हैं, ए-ग्रेड नर्सों के सभी 114 पद खाली हैं. हालांकि यह स्थिति पूरे बिहार की है. राज्य सरकार ने 2019 के जुलाई महीने में सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर यह बात स्वीकार की थी.

इस बीमारी के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि अब तक इसके सटीक कारणों का पता नहीं चल पाया है. 1995 से ही उत्तर बिहार के जिलों में इस बीमारी से बच्चों की मौत होती रही है. पहले यह माना जाता था कि चूंकि लीची के मौसम में बच्चों की मौत होती है, इसलिए इस रोग से लीची का कोई न कोई संबंध है. 2014 में लेंसेट नामक वैज्ञानिक शोध पत्रिका में प्रकाशित आलेख में बताया गया कि सड़ी-गली और कच्ची लीची के सेवन से बच्चों का सुगर लेवल तेजी से नीचे जाता है, इस वजह से बच्चों की मौत हो जाती है. हालांकि इस शोध पर कई सवाल उठे. पिछले साल यह बताया गया कि तेज गर्मी के मौसम में खेलने से बच्चे इस बीमारी के चपेट में आ रहे हैं. दिलचस्प है कि इस साल अभी तक न लीची का मौसम शुरू हुआ है, न कोई गर्मी का ही कोई प्रकोप है, इसके बावजूद बड़ी संख्या में बच्चे बीमार हो रहे हैं. 2014 से ही मुजफ्फरपुर में इस बीमारी को लेकर शोध किए जाने के लिए एक शोध संस्थान खोलने की बात चल रही है, 2019 में भी केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने इस वायदे को दुहराया. मगर अभी तक शोध संस्थान खुल नहीं पाया है.

ऐसे में प्रभावित क्षेत्र की गरीब आबादी के बीच जागरूकता, बच्चों को कुपोषण से बचाना, उन्हें भूखे पेट न सोने देना, बीमारी के लक्षण दिखते ही उन्हें पास के अस्पताल में तत्काल पहुंचा और ग्रामीण क्षेत्र के सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर और कारगर बनाना ही इस रोग से बच्चों को बचाने का सबसे प्रभावी उपाय माना जा रहा है.

पिछले साल इन मौतों औऱ राज्य सरकार के स्वास्थ्य विभाग की कमियों पर गंभीर सवाल उठने पर बिहार सरकार ने फैसला किया था कि अगले साल ऐसी तैयारी की जाएगी कि बच्चों की कम से कम मौत हो. मगर कुछ तो सरकारी तैयारी में हुए विलंब और कुछ कोरोना के प्रकोप की वजह से जिस तैयारी की बात की गई थी, वह हो नहीं पाई. तय हुआ था कि मार्च महीने के आखिर तक मुजफ्फरपुर के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल एसकेएमसीएच में 100 बेड का स्पेशल पीकू वार्ड बन जाएगा, मगर वह अभी तक तैयार नहीं हो पाया है. राज्य के रिक्त डॉक्टरों और नर्सों के पदों को भरने की बाद भी मार्च महीने तक थी. मगर संभवतः कोरोना की वजह से वह नियुक्ति नहीं हो पाई और इस बुधवार को फिर से मुजफ्फरपुर के एसकेएमसीएच के लिए 1039 डॉक्टरों-नर्सों की नियुक्ति का फैसला कैबिनेट में पास हुआ है.

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कोरोना के दौर में चमकी बुखार को लेकर सरकारी तैयारियां भरोसा नहीं जगा रहीं. (फाइल फोटो)

कोरोना संक्रमण और प्रभावित इलाकों में घर-घर जाकर लोगों को जागरूक करने का काम लॉकडाउन की वजह से काफी प्रभावित हो रहा है. पहले स्वयंसेवी संस्थाओं की भी इस जागरूकता अभियान में भाग लेने की बात थी, मगर अभी सिर्फ सरकार की तरह से थोड़ी बहुत पहल की जा रही है. कुपोषित बच्चों को पोषाहार बंटने का काम भी लॉकडाउन की वजह से प्रभावित हो रहा है. हालांकि राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इन इलाकों में घर-घर मिल्क पाउडर बांटने की घोषणा की है.

इस बीमारी में बच्चों को बचाने के लिए उनका समय से अस्पताल पहुंचना सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है. अगर बच्चा बुखार आने के छह घंटे के भीतर अस्पताल पहुंच जाता है तो उसके बचने की संभावना काफी बढ़ जाती है. पिछले साल आस-पड़ोस के कई लोगों ने बाइक और ऑटो से ऐसे बच्चों को अस्पताल पहुंचाया था. अब लॉकडाउन में इन बच्चों को अस्पताल पहुंचाने की पूरी जिम्मेदारी सरकारी एंबुलेंसों पर है, जिनकी संख्या काफी कम है. इस बीमारी से प्रभावित होने वाले 11 जिलों में कुल 397 एंबुलेंस हैं, इनमें से कई एंबुलेंस कोरोना के काम में लगे होंगे. हालांकि सरकार ने बीमार बच्चों को अस्पताल लाने पर वाहनों का किराया देने की भी घोषणा की है. हर वाहन के किराये की दर घोषित की गई है. मगर कोरोना संक्रमण के खौफ और इस लॉकडाउन की अवधि में इन गरीब बच्चों को निजी वाहन कहां से मिलेगा और अस्पताल तक पहुंचने में उन्हें कितनी बाधाओं का सामना करना पड़ेगा, यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है.

हालांकि इस साल सरकार थोड़ी गंभीर नजर आ रही है. संभवतः चुनावी वर्ष होने की वजह से वह अतिरिक्त सजगता का प्रदर्शन कर रही है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा बार-बार घोषणा की जा रही है कि कोरोना की वजह से बच्चों को मरने नहीं दिया जाएगा. हर मौत के बाद जांच हो रही है और संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी हो रहा है. हर दो-तीन दिन बाद किसी नई योजना की जानकारी दी जा रही है. यह भी कहा गया है कि कोरोना संक्रमण के लिए चल रहे घर-घर सर्वे में चमकी बुखार से संबंधित जानकारी भी ली जाए. मगर इसके बावजूद जमीनी हालात इतने जटिल हैं कि अभी से बच्चों का मरना जारी है. इस साल तो कुछ नए इलाकों में भी इस बीमारी की जानकारी मिल रही है. नालंदा जिले में इस रोग की वजह से दो बच्चों के मरने की खबर है, हालांकि सरकार ने इसकी पुष्टि नहीं की है.

इन परिस्थितियों को देखते हुए सरकारी तैयारियां और आश्वासन बहुत भरोसा नहीं जगा रहे. ज्यादातर तैयारियां आधी-अधूरी हैं. कोरोना और लॉकडाउन की वजह से हालात पहले से प्रतिकूल हैं. इस बार समाज भी इन बच्चों की बहुत अधिक मदद करने की स्थिति में नहीं है. शुरुआती मामले अलग ही भय का माहौल बना रहे हैं. ऐसे में यह देखना होगा कि सरकार इस बीमारी से कैसे जूझती है. ये गरीब, कुपोषित और लाचार बच्चे इस अज्ञात रोग के मुकाबला कर पाते हैं या नहीं.

डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.

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