घूमर करते समय चेहरा क्यों ढकती हैं महिलाएं? दिलचस्प है इसकी कबीले से निकलकर राजघरानों तक पहुंचने की कहानी

नई दिल्ली। राजस्थान अपनी कला और संस्कृति के लिए जाना जाता है और इसमें सबसे ऊपर घूमर का नाम आता है। घूमर राजस्थान का लोकनृत्य है, जो आज दुनियाभर में मशहूर है। राजस्थान के शादी-ब्याह से लेकर तीज जैसे त्योहारों पर घूमर जरूर किया जाता है।
घूमर अपनी गोल घेरे और खूबसूरत लय-ताल के लिए जाना जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि घूमर की शुरुआत कैसे हुई? आइए जानें घूमर की शुरुआत कैसे हुई और क्यों यह नृत्य इतना खास माना जाता है?
कबीले से राजमहल तक पहुंचने का सफर
घूमर शब्द घूमने से बना है। इस डांस को गोल घेरे में घूमते हुए किया जाता है, इसलिए इसका नाम घूमर पड़ा। इस डांस के इतिहास की बात करें, तो यह सदियों पुराना है और माना जाता है कि इसकी शुरुआत भील जनजाति ने की थी। पुराने समय में भील समुदाय की महिलाएं पूजा करने और खुशी के मौकों पर किया करती थीं, जो आगे चलकर घूमर बना। जब राजपूत राजाओं का राजस्थान पर शासन हुआ, तो भील जनजाति से जुड़ा ये नृत्य । कछवाहा राजवंश के दौरान घूमर को शाही दरबार में खास जगह मिली और राजपूत महिलाओं ने इसे अपनाया। तभी से ये नृत्य राजसी गरिमा के साथ जुड़ गया। इस तरह जो नृत्य कभी एक जनजाति के कबीले से शुरू हुआ था, राजपूतों के शाही महल का हिस्सा बन गया। घूमर के नाम से ही समझ आता है कि इसे गोल घेरे में किया जाता है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी शालीनता है। इस नृत्य के लिए महिलाएं एक गोल घेरा बनाकर खड़ी होती हैं और क्लॉकवाइज और एंटी-क्लॉकवाइज घूमते हुए नृत्य करती हैं।




