मंडला में बाघों का स्वर्ग बना गिद्दों का घर, कान्हा में फोटो लेने और गिनने की होड़

मंडला: मध्य प्रदेश के कान्हा नेशनल पार्क में इन दिनों सिर्फ बाघों की दहाड़ ही नहीं, बल्कि आसमान में मंडराते जंगल के सफाईकर्मियों की मौजूदगी भी चर्चा में है. जंगल के सफाईकर्मी गिद्धों को कहा जाता है. मंडला स्थित कान्हा नेशनल पार्क में 22 से 24 मई तक चली ग्रीष्मकालीन गिद्ध गणना-2026 ने न सिर्फ वन विभाग को राहत दी, बल्कि यह संकेत भी दिया कि विलुप्ति के कगार पर पहुंचे गिद्ध अब धीरे-धीरे अपने पुराने आसमान में लौट रहे हैं. जनगणना में 333 गिद्ध पाए गए हैं.
कान्हा में गिद्धों की गणना पूरी
कान्हा टाइगर रिजर्व में 22 से 24 मई तक आयोजित ग्रीष्मकालीन गिद्ध गणना-2026 सफलतापूर्वक संपन्न हो गई. मध्य प्रदेश वन विभाग की ओर से संचालित इस तीन दिवसीय अभियान में कान्हा, किसली, मुक्की और सरही परिक्षेत्रों सहित कोर एवं बफर क्षेत्रों में गिद्धों की संख्या और प्रजातियों का वैज्ञानिक आकलन किया गया. गणना के लिए 182 बीटों में प्रशिक्षित वन अमले को तैनात किया गया था.
कान्हा में नजर आए सफेद पीठ वाले गिद्ध
वनकर्मियों ने ‘गरुड़ मोबाइल ऐप’ और डेटा शीट का उपयोग कर गिद्धों की पहचान और गणना की. इस अभियान में भारतीय गिद्ध, सफेद पीठ वाले गिद्ध और राज गिद्ध जैसी प्रजातियां दर्ज की गईं. दूसरे दिन 23 मई को यह संख्या बढ़कर 333 हो गई, जो इस वर्ष की सर्वाधिक संख्या रही. अंतिम दिन, 24 मई को 263 गिद्ध दर्ज किए गए, जिनमें 242 वयस्क और 21 अवयस्क गिद्ध शामिल थे. अंतिम दिन भारतीय गिद्ध और सफेद पीठ वाले गिद्ध की दो प्रजातियां देखी गईं.
भारत में 9 प्रजातियों के पाए जाते हैं गिद्ध
कान्हा प्रबंधन के अनुसार, इस वर्ष की गणना में दर्ज 333 गिद्धों की संख्या एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है. इससे पहले फरवरी 2026 में हुई शीतकालीन गिद्ध गणना में 224 गिद्ध और 50 घोंसले चिन्हित किए गए थे. वन विभाग के अनुसार, भारत में गिद्धों की कुल 9 प्रजातियां पाई जाती हैं. जिनमें से अधिकांश लुप्तप्राय हैं, कान्हा में मुख्य रूप से व्हाइट-बैक्ड गिद्ध, भारतीय गिद्ध, हिमालयन ग्रिफॉन, लॉन्ग-बिल्ड गिद्ध और किंग वल्चर जैसी प्रजातियां मिलती हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि गिद्ध पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखने और बीमारियों के प्रसार को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. इस प्रकार की गणनाएं गिद्ध संरक्षण और उनके आवासीय व्यवहार को समझने में सहायक होती हैं. वन विभाग इसे सिर्फ एक गणना नहीं, बल्कि संरक्षण की दिशा में बड़ी सफलता मान रहा है.
कान्हा टाइगर रिजर्व के एसडीओ आशीष पांडे ने बताया कि, ”कान्हा टाईगर रिजर्व में 22 मई से 24 मई तीन दिवसी गिद्ध गणना की गई. जिस में किसली मुक्की और सरही के बफर और कोर जोन में गड़ना की गई. जिसमें 333 गिद्ध पाए गए. कान्हा टाइगर रिजर्व अंतर्गत चल रही तीन दिवसीय ग्रीष्मकालीन गिद्ध गणना अपने अंतिम दिन संपन्न हो गई. गणना के तीसरे और अंतिम दिन कान्हा, मुक्की, सरही और किसली परिक्षेत्रों में कुल 263 गिद्ध देखे गए. जिनमें भारतीय
गिद्ध और सफेद पीठ वाले गिद्ध शामिल हैं. कुल गणना में 242 वयस्क तथा 21 अवयस्क गिद्ध शामिल पाए गए.”जिन पेड़ों पर गिद्ध बैठते हैं उनका विशेष रख रखाव
कान्हा नेशनल पार्क के सहायक संचालक प्रकाश वर्मा ने बताया कि, ”गिद्धों के संरक्षण के लिए विशेष कोई इंतजाम तो नहीं किया जाता, लेकिन वन क्षेत्र में मृत वन प्राणियों का शव परीक्षण के बाद वन प्राणियों के शव को जंगल में ही छोड़ दिया जाता है. जो गिद्धों के भोजन के रूप में काम आता है. जिन पेड़ों पर गिद्ध का रहना होता है उस पेड़ का विशेष रख रखा किया जाता है. जंगल के किनारे ग्रामीण क्षेत्रो के ग्रामीणों को भी जागरूक किया जाता है कि गिद्धों की रक्षा करें.’गिद्ध को क्यों कहते हैं सफाई का दरोगा?
गिद्धों को सफाई का दरोगा इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह जमीन पर पड़ा सड़ा गला मांस खाकर वहां की सफाई करते हैं. जंगल में मांसाहारी जानवर शिकार करने के बाद पूरा मांस नहीं खाते, बचा हुआ वहीं छोड़ देते हैं. ऐसे में यदि यह बचा हुआ मांस जंगल में पड़ा रहेगा तो अनेक तरह की बीमारियां फैलेंगी और जीवों के लिए भी हानिकारक हैं. गिद्ध उस मांस को ढूंढ-ढूंढकर खाते हैं. जिससे वातावरण साफ रहता है. गिद्ध की खासियत यह है कि उनकी निगाह काफी तेज होती है और उन्हें कई किलोमीटर दूर से भी अपना भोजन दिखाई दे जाता है.गिद्ध भी बचाएंगे जंगल का संतुलन
फरवरी 2026 की शीतकालीन गणना में यहां 224 गिद्ध और 50 घोंसले दर्ज किए गए थे. ऐसे में गर्मियों में 333 गिद्धों का आंकड़ा वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से बेहद सकारात्मक माना जा रहा है. बता दें कि कान्हा को आमतौर पर टाइगर रिजर्व के तौर पर जाना जाता है, लेकिन इस गणना ने साफ कर दिया कि जंगल का असली संतुलन सिर्फ बाघों से नहीं, बल्कि उन गिद्धों से भी बना रहता है जो चुपचाप पूरे इकोसिस्टम को साफ और सुरक्षित रखने में जुटे रहते हैं. इसलिए इनको सफाई का दरोगा भी कहा जाता है.


