पानी पर तैरता पर्दा और शिकारे में दर्शक… कश्मीर में सिनेमा की खूबसूरत वापसी, फिल्में देख लोगों की आंखें हुईं नम

श्रीनगर। कल्पना कीजिए। शाम ढले डल झील का पानी बिल्कुल शांत है, पीछे जबरवान की पहाड़ियों पर आखिरी धूप है और झील के बीचों-बीच एक बड़ा सा परदा पानी पर तैर रहा है। उस परदे के सामने आप किसी मल्टीप्लेक्स की कुर्सी पर नहीं बल्कि लकड़ी के एक शिकारे में बैठे हैं। डल झील की हल्की लहरों के साथ हिलते हुए। यह कोई फिल्मी सीन नहीं, यह आज के कश्मीर की नई हकीकत है।
जम्मू-कश्मीर में इस वक्त जो हो रहा है, वह सिर्फ एक फेस्टिवल नहीं, एक वापसी है। श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस सेंटर (एसकेआइसीसी) में इस समय जम्मू-कश्मीर का पहला इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ‘रंग-ए-सिनेमा’ चल रहा है। 10 सितंबर तक 41 देशों की 135 फिल्में यहां दिखाई जाएंगी, लेकिन जिस एक चीज ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है, वह है डल झील पर लगा फ्लोटिंग सिनेमा।
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ऐसा सिनेमा आपने कभी नहीं देखा होगा
आयोजकों ने एसकेआइसीसी के बिल्कुल पास, डल झील के पानी पर एक विशाल फ्लोटिंग स्क्रीन लगाई है। दर्शकों के लिए कोई रेड कार्पेट नहीं, बल्कि कतार में लगे शिकारे हैं। आप शिकारे में बैठते हैं, खेवैया धीरे से शिकारे को थोड़ा आगे ले जाता है और फिर अंधेरा होते ही फिल्म शुरू।
इस फ्लोटिंग सिनेमा का मकसद सिर्फ फिल्म दिखाना नहीं है। सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की डायरेक्टर श्रेया सिंघल ने इसे फेस्टिवल का सबसे अलग विजुअल और अनुभव वाला हिस्सा बताया है, जो कश्मीर की कुदरती खूबसूरती को दुनिया के फिल्म मेकर्स के सामने पेश करेगा। और इस पर दिख क्या रहा है? वही फिल्में, जिनकी वजह से कश्मीर हमेशा से पर्दे पर जिंदा रहा है।
जब कई बुजुर्गों की आंखें नम हुईं
फेस्टिवल में फ्लोटिंग स्क्रीन पर उन आइकॉनिक बॉलीवुड फिल्मों की स्पेशल स्क्रीनिंग रखी गई है, जिनकी शूटिंग कश्मीर की वादियों में हुई थी। जैसे कि ‘जंगली’, ‘आरज़ू’, ‘कश्मीर की कली’ और ‘कभी कभी’। सोचिए, जिस झील के किनारे फिल्म आरजू में कभी साधना ने गाना गाया था, उसी झील पर आज उसी फिल्म को देखना… यह नॉस्टेल्जिया नहीं तो और क्या है?
आज मंगलवार शाम जब ‘आरजू’ का प्रसिद्ध गाना ‘अजी रूठ कर अब कहां जाइएगा’ पानी पर गूंजा, तो किनारे खड़े कई बुजुर्गों की आंखें नम थीं। उनके लिए यह सिर्फ फिल्म नहीं, उनका बचपन था, जब कश्मीर में हर गली में थिएटर हुआ करते थे।
पिछले तीन दशकों में कश्मीर ने सिनेमा हॉल बंद होते देखे। अब उसी जगह, जहां जी20 टूरिज्म मीटिंग के बाद यह दूसरा सबसे बड़ा ग्लोबल इवेंट हो रहा है, युवा फिर से बड़े परदे की तरफ लौट रहे हैं।
सिर्फ फिल्म नहीं, पूरी कश्मीरियत का जश्न
यह फेस्टिवल सिर्फ एसकेआइसीसी तक सीमित नहीं है। इसकी स्क्रीनिंग श्रीनगर के आइएनओएक्स पीवीआर, जम्मू के वेव्स मॉल सिनेमा और एक दिन के लिए गुलमर्ग में भी हो रही है।
साथ ही मास्टरक्लास, पैनल डिस्कशन, स्थानीय यूनिवर्सिटी के छात्रों का फिल्ममेकर्स से मिलना, हैंडीक्राफ्ट, हेंडलूम, वाजवान की खुशबू, सब कुछ इसी ‘रंग-ए-सिनेमा’ का हिस्सा है। असल में यह फेस्टिवल एक मैसेज है कि कश्मीर सिर्फ खबरों में दिखने वाली जगह नहीं, कहानियां गढ़ने और दिखाने वाली जगह भी है।



