20 रुपये की फीस, 700 रुपये का आविष्कार, नेत्रहीनों की राह आसान बनाएगा बाबूलाल का ‘स्मार्ट गॉगल्स’

रांची:कहा गया है कि “सिर्फ बदलाव की इच्छा से कुछ नहीं बदलता, तत्काल कार्य करने के निर्णय से सब कुछ बदल जाता है.” इस विचार को अपनी मेहनत और लगन से सच साबित कर दिखाया है 17 वर्षीय बाबूलाल करमाली ने. आर्थिक रूप से साधारण परिवार से आने वाला यह छात्र आज अपने अनोखे नवाचार के कारण चर्चा में है. सरकारी आईटीआई हेहल के इलेक्ट्रॉनिक्स एंड मैकेनिक्स विभाग में पढ़ने वाले बाबूलाल ने महज 700 रुपये की लागत से ऐसा स्मार्ट गॉगल्स तैयार किया है, जो नेत्रहीन दिव्यांगजनों के लिए सुरक्षित आवाजाही का सहारा बन सकता है.
बाबूलाल के इस आविष्कार की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसकी प्रेरणा किसी प्रयोगशाला या किताब से नहीं, बल्कि उसके अपने परिवार से मिली. उसका बड़ा भाई नेत्रहीन है. रोजमर्रा की जिंदगी में भाई को रास्ते में ठोकर खाते, बाधाओं से टकराते और दूसरों पर निर्भर होते देखकर बाबूलाल का मन व्यथित हो जाता था. उसने तभी तय कर लिया कि वह ऐसा उपकरण बनाएगा, जिससे नेत्रहीन लोगों का सफर आसान और सुरक्षित हो सके.
शिक्षकों का मिला मार्गदर्शन
इलेक्ट्रॉनिक्स एंड मैकेनिक्स विभाग का छात्र होने के कारण बाबूलाल ने अपने शिक्षकों के मार्गदर्शन में इस विचार को आकार देना शुरू किया. कई प्रयोगों और लगातार मेहनत के बाद उसने एक ऐसा स्मार्ट गॉगल्स तैयार किया, जिसमें सेंसर लगाए गए हैं. जैसे ही इसे पहनने वाला व्यक्ति किसी दीवार, खंभे, वाहन या अन्य वस्तु के करीब पहुंचता है, गॉगल्स तुरंत ध्वनि संकेत और सायरन के माध्यम से उसे सचेत कर देता है. इससे नेत्रहीन व्यक्ति समय रहते दिशा बदल सकता है और दुर्घटना से बच सकता है. कम लागत में तैयार यह उपकरण भविष्य में हजारों दिव्यांगजनों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है.आईटीआई हेहल के प्राचार्य परमानंद रजक ने बाबूलाल की उपलब्धि पर गर्व जताते हुए कहा कि ऐसे विद्यार्थी किसी भी संस्थान की सबसे बड़ी पहचान होते हैं. उन्होंने कहा कि बाबूलाल ने अपनी प्रतिभा, मेहनत और सामाजिक सोच से न सिर्फ संस्थान बल्कि पूरे राज्य का नाम रोशन किया है. ऐसे नवाचार यह साबित करते हैं कि सरकारी संस्थानों में पढ़ने वाले छात्र भी अपनी क्षमता के दम पर बड़े बदलाव ला सकते हैं.
पढ़ाई के लिए लगती है 20 रुपये की फीस
बाबूलाल ने बताया कि उसके परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं है. उसने सरकारी आईटीआई में मात्र 500 रुपये प्रवेश शुल्क देकर दाखिला लिया और हर महीने केवल 20 रुपये की फीस देकर अपनी पढ़ाई जारी रखी है. सीमित संसाधनों के बावजूद उसने कभी अपने सपनों को छोटा नहीं होने दिया. भाई की परेशानियों ने उसे कुछ नया करने की प्रेरणा दी और उसी प्रेरणा ने इस स्मार्ट गॉगल्स का रूप ले लिया.संस्थान की शिक्षिका ने भी बाबूलाल की सराहना करते हुए कहा कि वह शुरू से ही नए-नए तकनीकी आइडिया लेकर आता था. जब उसने स्मार्ट गॉगल्स बनाने की बात रखी तो शिक्षकों ने उसका पूरा सहयोग किया. आज उसका नवाचार इस बात का प्रमाण है कि प्रतिभा कभी संसाधनों की मोहताज नहीं होती.
ये है पहला मॉडल
बाबूलाल का कहना है कि यह स्मार्ट गॉगल्स अभी उसका पहला मॉडल है. उसने इसे सीमित संसाधनों और केवल 700 रुपये की लागत में तैयार किया है, लेकिन उसका सपना इसे और अधिक आधुनिक, स्मार्ट और उपयोगी बनाने का है. उसने इसके अगले मॉडल की पूरी रूपरेखा और डिजाइन पहले ही तैयार कर ली है. यदि उसे आर्थिक सहयोग और आवश्यक तकनीकी संसाधन मिलते हैं तो वह इसमें नई सुविधाएं जोड़ेगा, जिससे यह नेत्रहीन दिव्यांगजनों के लिए और अधिक सुरक्षित, सुविधाजनक और भरोसेमंद बन सके.
वह गॉगल्स के डिजाइन को हल्का, आकर्षक और उपयोग में अधिक आसान बनाना चाहता है, ताकि इसे हर उम्र का व्यक्ति आसानी से पहन सके. बाबूलाल का मानना है कि यदि उसके इस प्रोजेक्ट को उचित मंच और सहयोग मिला तो यह कम लागत वाला उपकरण देशभर के लाखों नेत्रहीन दिव्यांगजनों के लिए मददगार साबित हो सकता है.
बाबूलाल करमाली की यह उपलब्धि केवल एक छात्र की सफलता की कहानी नहीं, बल्कि इस बात का संदेश भी है कि बड़े बदलाव के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती. अगर सोच सकारात्मक हो, इरादे मजबूत हों और समाज के लिए कुछ करने का जज्बा हो, तो 20 रुपये की मासिक फीस देने वाला एक छात्र भी ऐसा नवाचार कर सकता है, जो हजारों लोगों की जिंदगी बदलने की क्षमता रखता हो
वह गॉगल्स के डिजाइन को हल्का, आकर्षक और उपयोग में अधिक आसान बनाना चाहता है, ताकि इसे हर उम्र का व्यक्ति आसानी से पहन सके. बाबूलाल का मानना है कि यदि उसके इस प्रोजेक्ट को उचित मंच और सहयोग मिला तो यह कम लागत वाला उपकरण देशभर के लाखों नेत्रहीन दिव्यांगजनों के लिए मददगार साबित हो सकता है.
बाबूलाल करमाली की यह उपलब्धि केवल एक छात्र की सफलता की कहानी नहीं, बल्कि इस बात का संदेश भी है कि बड़े बदलाव के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती. अगर सोच सकारात्मक हो, इरादे मजबूत हों और समाज के लिए कुछ करने का जज्बा हो, तो 20 रुपये की मासिक फीस देने वाला एक छात्र भी ऐसा नवाचार कर सकता है, जो हजारों लोगों की जिंदगी बदलने की क्षमता रखता हो.



