लोकतंत्र की रक्षा, संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती और राष्ट्रहित के लिए जन-जागरण आवश्यक : केंद्रीय राज्यमंत्री श्री तोखन साहू

लोकतंत्र की रक्षा, संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती और राष्ट्रहित के लिए जन-जागरण आवश्यक : केंद्रीय राज्यमंत्री श्री तोखन साहू
भाजपा की ‘लोकतंत्र बचाओ–अराजकता हटाओ’ पदयात्रा में केंद्रीय राज्यमंत्री श्री तोखन साहू ने कांग्रेस पर उठाए सवाल, आपातकाल, सरदार पटेल, डॉ. आंबेडकर और SIR के ऐतिहासिक संदर्भों का किया उल्लेख
बिलासपुर। भारतीय जनता पार्टी द्वारा आयोजित ‘लोकतंत्र बचाओ–अराजकता हटाओ’ पदयात्रा में केंद्रीय आवासन एवं शहरी कार्य राज्य मंत्री श्री तोखन साहू ने सहभागिता करते हुए प्रदेश भाजपा कार्यकर्ताओं एवं उपस्थित जनसमूह को संबोधित किया। गांधी चौक से नेहरू चौक तक आयोजित इस पदयात्रा के माध्यम से लोकतंत्र की गरिमा, संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, निष्पक्ष चुनाव और मतदाता सूची के शुद्धिकरण के प्रति जन-जागरूकता का संदेश दिया गया।
इस अवसर पर श्री तोखन साहू ने कहा कि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के साथ-साथ ‘मदर ऑफ डेमोक्रेसी’ के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। 90 करोड़ से अधिक मतदाताओं वाला हमारा देश लोकतांत्रिक परंपराओं, संवैधानिक व्यवस्था और जनभागीदारी का विश्व के सामने एक सशक्त उदाहरण है। चुनाव आयोग, सर्वोच्च न्यायालय सहित सभी संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और गरिमा का सम्मान करना प्रत्येक नागरिक का दायित्व है।
आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय
श्री साहू ने कहा कि 25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार द्वारा लगाया गया आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक काला अध्याय है। उस दौरान नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध लगाए गए, प्रेस की स्वतंत्रता प्रभावित हुई और विपक्षी नेताओं को जेल में बंद किया गया। लोकतंत्र में असहमति का सम्मान, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा अनिवार्य है।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस आज संविधान और लोकतंत्र की बात करती है, लेकिन देश की युवा पीढ़ी को कांग्रेस शासनकाल के उस इतिहास से भी परिचित होना चाहिए, जब लोकतांत्रिक अधिकारों और संस्थागत स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े हुए थे। इतिहास को याद रखना इसलिए आवश्यक है, ताकि भविष्य में लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ कभी समझौता न हो।
डॉ . आंबेडकर और सरदार पटेल के साथ हुए ऐतिहासिक राजनीतिक घटनाक्रम का किया उल्लेख
श्री तोखन साहू ने कांग्रेस की राजनीतिक विरासत का उल्लेख करते हुए डॉ. भीमराव आंबेडकर के राजनीतिक जीवन से जुड़े प्रसंगों पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि आज कांग्रेस संविधान और बाबा साहेब के नाम पर राजनीति करती है, लेकिन वर्ष 1952 के लोकसभा चुनाव और 1954 के भंडारा उपचुनाव में डॉ. आंबेडकर को मिली चुनावी पराजय से जुड़े ऐतिहासिक घटनाक्रम को भी याद किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि संविधान निर्माता के योगदान और उनके राजनीतिक जीवन से जुड़े तथ्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाना आवश्यक है।
इसी क्रम में उन्होंने वर्ष 1946 में कांग्रेस अध्यक्ष पद के चयन से जुड़े घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए कहा कि कांग्रेस की 15 प्रांतीय कांग्रेस समितियों में से 12 ने सरदार वल्लभभाई पटेल के पक्ष में समर्थन व्यक्त किया था, जबकि किसी भी प्रांतीय समिति ने पंडित जवाहरलाल नेहरू के पक्ष में प्रस्ताव नहीं दिया था। इसके बावजूद कांग्रेस नेतृत्व के निर्णय से सरदार पटेल को अध्यक्ष पद नहीं मिला।
श्री साहू ने कहा कि सरदार वल्लभभाई पटेल ने स्वतंत्रता के बाद 560 से अधिक रियासतों के एकीकरण में ऐतिहासिक भूमिका निभाकर आधुनिक भारत की एकता और अखंडता की मजबूत नींव रखी। ऐसे महान राष्ट्रनिर्माता के योगदान और उनसे जुड़े ऐतिहासिक राजनीतिक प्रसंगों को देश की युवा पीढ़ी तक पहुंचाना आवश्यक है।
नेहरू से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक विभिन्न सरकारों के कार्यकाल में हुआ मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision–SIR) के ऐतिहासिक संदर्भों को सामने रखते हुए श्री तोखन साहू ने कहा कि मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण भारतीय चुनावी व्यवस्था का पुराना और स्थापित हिस्सा रहा है। यह प्रक्रिया किसी एक राजनीतिक दल या सरकार तक सीमित नहीं रही, बल्कि अलग-अलग प्रधानमंत्रियों और सरकारों के कार्यकाल में समय-समय पर अपनाई गई है।
उन्होंने ऐतिहासिक क्रम का उल्लेख करते हुए बताया कि निर्वाचन आयोग के अभिलेखों के अनुसार विभिन्न वर्षों में देश के अलग-अलग हिस्सों में गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया संचालित की गई।
- वर्ष 1952 से 1956: प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में चरणबद्ध गहन पुनरीक्षण हुआ।
- वर्ष 1957 और 1961: पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के दौरान पुनरीक्षण की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
- वर्ष 1965: तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में गहन पुनरीक्षण हुआ।
- वर्ष 1966: प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के दौरान पुनरीक्षण किया गया।
- वर्ष 1983–84: श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में गहन पुनरीक्षण हुआ।
- वर्ष 1987–89: तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के समय यह प्रक्रिया अपनाई गई।
- वर्ष 1992, 1993 और 1995: तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में विभिन्न चरणों में गहन पुनरीक्षण हुआ।
- वर्ष 2002–03: तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) सरकार के कार्यकाल में गहन पुनरीक्षण हुआ। वर्ष 2004 में इस गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया का समापन हुआ।
श्री साहू ने कहा कि यह ऐतिहासिक क्रम स्पष्ट करता है कि मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था का नियमित प्रशासनिक एवं चुनावी महत्व रखने वाला विषय रहा है। पूर्ववर्ती सरकारों के कार्यकाल में भी यह प्रक्रिया अपनाई गई थी। ऐसे में आज इस प्रक्रिया को लेकर भ्रम फैलाने के बजाय इसकी पारदर्शिता, निष्पक्षता और प्रभावी क्रियान्वयन में सहयोग किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूची को अधिक शुद्ध, अद्यतन और विश्वसनीय बनाने की दिशा में विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।
शुद्ध मतदाता सूची स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव की आधारशिला
श्री साहू ने कहा कि लोकतंत्र में प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में होना और मृत मतदाताओं, दोहरी प्रविष्टियों तथा अन्य अपात्र प्रविष्टियों की नियमानुसार पहचान करना आवश्यक है। मतदाता सूची का पुनरीक्षण इस उद्देश्य से किया जाता है कि चुनावी प्रक्रिया अधिक विश्वसनीय और पारदर्शी बन सके। साथ ही यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि किसी भी पात्र मतदाता का नाम सूची से न छूटे और प्रत्येक कार्रवाई निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप हो।
उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग और संवैधानिक संस्थाओं के कार्यों पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बजाय तथ्यों एवं संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर चर्चा होनी चाहिए। लोकतंत्र में जनता का जनादेश सर्वोपरि है। चुनाव में जीत और हार दोनों को लोकतांत्रिक भावना के साथ स्वीकार करना सभी राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है।
युवा शक्ति विकसित भारत के निर्माण की सबसे बड़ी ताकत
युवाओं की भूमिका पर विशेष जोर देते हुए केंद्रीय राज्यमंत्री श्री तोखन साहू ने कहा कि आज का युवा भारत की बदलती तस्वीर का प्रतिनिधित्व करता है। वह स्टार्टअप, डिजिटल क्रांति, नवाचार, उद्यमिता, विज्ञान और सामाजिक नेतृत्व के माध्यम से राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। आज का युवा केवल वर्तमान की चुनौतियों को समझने वाला नहीं, बल्कि विकसित भारत के भविष्य का निर्माण करने वाला नेतृत्व है।
उन्होंने भाजपा कार्यकर्ताओं से आह्वान किया कि वे आपातकाल के इतिहास, डॉ. आंबेडकर और सरदार पटेल से जुड़े ऐतिहासिक प्रसंगों, लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका तथा मतदाता सूची के शुद्धिकरण जैसे विषयों को तथ्यों के साथ जन-जन तक पहुंचाएं। विशेषकर युवाओं को देश के लोकतांत्रिक इतिहास, संविधान की भावना और नागरिक अधिकारों के प्रति जागरूक करें।
श्री साहू ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत विकसित भारत @2047 के संकल्प की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मजबूत लोकतंत्र, पारदर्शी व्यवस्था, जवाबदेह संस्थाएं और जागरूक नागरिक आवश्यक हैं। राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन राष्ट्रहित, संविधान की गरिमा और लोकतंत्र की मजबूती हम सभी की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि जनता के विश्वास, अधिकारों और आकांक्षाओं का सम्मान करने वाली व्यवस्था है। इसकी रक्षा के लिए प्रत्येक नागरिक और विशेषकर युवा पीढ़ी को सजग, जागरूक एवं जिम्मेदार भूमिका निभानी होगी।


