छत्तीसगढ़

बस्तरवासियों का ऐतिहासिक निर्णय, छटवीं अनुसूची और पृथक बस्तर राज्य की मांग का ऐलान, बड़ी लड़ाई की तैयारी

जगदलपुर: 24 दिसंबर 1996 को भारत देश में लागू हुए पेसा कानून अधिनियम को आज 29 साल पूरे हो चुके हैं. 29 साल पूरे होने पर छत्तीसगढ़ के अनुसूचित क्षेत्र बस्तर में आज पेशा दिवस मनाया गया. यह पेसा दिवस बस्तर जिले के बुरुंगपाल में मनाया गया. जहां आसपास के सैकड़ों ग्रामीण इकट्ठे हुए थे. इसके अलावा लोगों को जागरूक करने के लिए जन आंदोलन से जुड़े नेता भी मौजूद रहे. सबसे खास बात यह है कि बस्तर जिले के बुरुंगपाल व आसपास के ही कुछ गांव भारत देश में एक ऐसे हैं, जहां स्थानीय नागरिक न केवल संविधान के नियमों को मानते हैं बल्कि उसकी गुड़ी ( मंदिर) बनाकर उसमें पूजा अर्चना भी हर साल करते हैं. हर साल ग्रामीणों कि यह परंपरा काफी अनोखी व रोचक रहती है. स्थानीय लोगों ने बताया कि सन 1996 में बस्तर जिले के बुरुंगपाल से ही पेसा कानून अधिनियम की ड्राफ्टिंग डॉ. बीडी. शर्मा ने की थी. और वहीं बैठकर उन्होंने ग्राम सभा और पेशा कानून को मजबूत करने के लिए लड़ाई लड़ा था. इस लड़ाई के माध्यम से डिलमिली में प्रस्तावित डायकेन नामक फैक्ट्री को भी निरस्त करवाया था.

बस्तरवासियों का ऐतिहासिक निर्णय

इसी उद्देश्य से प्रतिवर्ष स्थानीय नागरिक पेशा दिवस मनाते हैं. ग्रामीणों के लिए साल 2025 का पेसा दिवस काफी ऐतेहासिक होगा. क्योंकि ग्रामीणों ने आज 24 दिसम्बर 2025 को पृथक बस्तर राज्य बनाने और छठवीं अनुसूची की मांग को लेकर लड़ाई लड़ने का विधिवत ऐलान कर दिया है. भारत जनांदोलन के सदस्य विजय भाई ने बताया कि ”पेसा कानून को 29 साल पूर्ण हो चुके हैं. लेकिन सही तरीके से देश में इसे लागू नहीं किया गया. पेसा कानून की मंशा यह थी कि अनुसूचित क्षेत्रों में वंचितों को अधिकार मिले, जो संविधान के अनुच्छेद 40 के तहत दी गई है. स्व-शासन का मतलब यह है कि सरकार खुद होंगे और शासन खुद करेंगे. वित्तीय अधिकार भी होगा. आंदोलन से जुड़े लोग कहते हैं कि 29 साल से अनुसूचित क्षेत्रो में पंचायती राज गलत तरीके से लागू किया गया”.भारत जनांदोलन के सदस्य विजय भाई ने बताया कि ”फिलहाल जिला सरकार और ग्राम सरकार को लागू करने की आवश्यकता है. अनुसूचित क्षेत्रों में जल जंगल और जमीन पर बड़े पैमाने पर हमला हो रहा है. छीना जा रहा है. स्थिति काफी खराब है. यदि ऐसा ही चलता रहेगा तो मूल निवासी नहीं बचेंगे. आजादी के बाद जितने भी मूलनिवासी विस्थापित हुए हैं, उनका कोई आंकड़ा नहीं है. इस देश मे संभावित 40 प्रतिशत विस्थापित मूलनिवासी हैं. क्योंकि उनके ही पास संसाधन है और उन्हें ही हड़पा जा रहा है. सबसे अधिक धनाढ्य इलाका अनुसूचित क्षेत्र है. उनको हड़पने के लिए ऐसी योजना है. बस्तर में अब बड़ी लड़ाई शांतिपूर्ण तरीके से लड़ी जाएगी”.

बस्तर राज मोर्चा के प्रमुख ने किया ऐलान

बस्तर राज मोर्चा के प्रमुख मनीष कुंजाम ने कहा कि ”वर्ष 1992 में डायकेन नामक कंपनी को कारखाना लगाने के लिए 6 गांव की जमीन देने के लिए तत्कालीन सरकार ने अनुमति दी थी. उस कंपनी के खिलाफ जो लड़ाई हुई, उस लड़ाई का सबसे प्रमुख स्थान बुरुंगपाल है. जिसके सूत्रधार बीडी शर्मा थे. वहीं पेसा कानून में ग्राम सभा से जुड़े नियम और नारे इसी स्थान से गढ़े गए थे. इसीलिए यह एक तीर्थ स्थल भी है. नारे में ”मावा नाटे मावा राज”, ”आम्चो गांव ने आम्चो राज” ( हमारे गांव में हमारा राज) जो पूरे देश में गूंजता है.”

छटवीं अनुसूची की मांग कोई नई मांग नहीं है. 1994 से 1998 तक इस मांग को लेकर जबरदस्त लड़ाई हुई. और हमारे प्रयास से पेसा कानून का हिस्सा छटवीं अनुसूची बन गया. आज की कोई भी सरकार पेसा पर बात करते हैं, लेकिन छटवीं अनुसूची पर चर्चा नहीं करते हैं. इस प्रावधान में जिलों और पंचायतों को स्वायता दी जाती है. जिसका अर्थ यह है कि राज्य सरकार का अधिकार जिले को ट्रांसफर हो जाता है. हमारे देश के अंदर 10 राज्य 5 वीं अनुसूची के हैं. जिनमें नार्थ ईस्ट के 04 राज्यों में छटवीं अनुसूची लागू है: मनीष कुंजाम, बस्तर राज मोर्चा के प्रमुख

छटवीं अनुसूची की लड़ाई का ऐलान

मनीष कुंजाम ने कहा कि आज बुरुंगपाल के मंच से छटवीं अनुसूची को लेकर लड़ने का ऐलान हुआ है. बस्तर के जल जंगल जमीन को ग्राम सभा के कानून से बचा नहीं पा रहे हैं. क्योंकि राज्य सरकार ग्राम सभा के अधिकार को नहीं मान रही है. जिसको कुचलने का प्रयास कर रही है. या फर्जी ग्राम सभा करके गांव को गुमराह कर रही है. इसीलिए यह चाहते हैं कि जिला स्तर पर सभी वर्ग के लोग होंगे जिनके पास अधिकार होगा, वे सभी मिलकर पूरा सरकार चलाएंगे. सब कुछ जिले में तय होगा, जो राज्य सरकार तय करती है. यही खासबात है. इसीलिए बस्तरवासियों की मांग है कि छटवीं अनुसूची के बगैर बस्तर को बचाना संभव नहीं है. इसीलिए पुनः विवश होकर छटवीं अनुसूची की मांग की गई है. उम्मीद है कि एक बड़ी लड़ाई बस्तर में लड़ी जाएगी, लोगों को गोलबंद करने की कोशिश की जाएगी.

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