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कुछ नदियों पर क्यों पड़ती है हैंगिंग ब्रिज की जरूरत, वहां क्यों नहीं लगाते पिलर?

जब भी हम पहाड़ों या किसी गहरी नदी के पास से गुजरते हैं, तो वहां बने बड़े-बड़े झूलते हुए पुल यानी हैंगिंग ब्रिज हमारा ध्यान खींच लेते हैं. ऋषिकेश का लक्ष्मण झूला या राम झूला इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं. इसके अलावा देश के कई अन्य हिस्सों और घाटियों में भी ऐसे ही पुलों का इस्तेमाल किया जाता है. ऐसे में अक्सर यह सवाल उठता है कि आखिर कुछ खास जगहों या नदियों पर ऐसे हैंगिंग ब्रिज की जरूरत क्यों पड़ती है और वहां आम पुलों की तरह जमीन से पिलर क्यों नहीं खड़े किए जाते हैं? आइए जानते हैं इसके पीछे का पूरा इंजीनियरिंग और भौगोलिक गणित.

गहरी घाटियों में पिलर बनाना मुश्किल

हैंगिंग ब्रिज ज्यादातर उन जगहों पर बनाए जाते हैं, जहां नदी बहुत गहरी घाटी या खाई से होकर गुजरती है. ऐसी जगहों पर पानी की सतह से नीचे जमीन तक की गहराई इतनी ज्यादा होती है कि वहां पिलर खड़ा करना न सिर्फ बेहद मुश्किल हो जाता है, बल्कि बेहद महंगा भी साबित होता है. पहाड़ी इलाकों में अक्सर ऐसी घाटियां देखने को मिलती हैं, जहां पिलर बनाने के लिए भारी मशीनरी ले जाना ही संभव नहीं होता.

नदी का तेज बहाव 

कई नदियों में पानी का बहाव इतना तेज और अनियंत्रित होता है कि पिलर बनाने पर उसके क्षतिग्रस्त होने का खतरा हमेशा बना रहता है. खासकर पहाड़ी नदियों में बारिश के  में पानी का स्तर अचानक बहुत बढ़ जाता है, जिससे पिलर पर लगातार दबाव पड़ता है. ऐसे हालात में इंजीनियर हैंगिंग ब्रिज को बेहतर विकल्प मानते हैं, क्योंकि यह पानी को छुए बिना ही दोनों किनारों को आपस में जोड़ देता है

कमजोर और रेतीली जमीन में खतरा ज्यादा

कुछ नदियों के आसपास की जमीन बहुत कमजोर, रेतीली या दलदली होती है, जो भारी पिलर का वजन सहन नहीं कर पाती. ऐसी जमीन पर पिलर बनाने पर समय के साथ वह धंसने या झुकने का खतरा रहता है, जिससे पूरे पुल की मजबूती पर सवाल खड़ा हो जाता है. इसके उलट हैंगिंग ब्रिज का पूरा वजन मजबूत केबल और दोनों किनारों पर बने ऊंचे टावरों पर टिका होता है, जिससे जमीन पर सीधा दबाव नहीं पड़ता.

भूकंप वाले इलाकों में भी है फायदेमंद

जिन इलाको में भूकंप का खतरा ज्यादा होता है, वहां भी हैंगिंग ब्रिज को ज्यादा सुरक्षित विकल्प माना जाता है. दरअसल, सामान्य पिलर वाले पुल के मुकाबले हैंगिंग ब्रिज में लचीलापन ज्यादा होता है, जिससे भूकंप के झटकों के दौरान यह थोड़ा हिल तो सकता है, लेकिन टूटने का खतरा काफी कम रहता है. यही वजह है कि पहाड़ी और  संभावित क्षेत्रों में इंजीनियर इस तकनीक को प्राथमिकता देते हैं.

कम समय और कम लागत में तैयार होता है पुल

गहरी घाटियों में सामान्य पुल बनाने में जहां कई साल लग सकते हैं और लागत भी बहुत ज्यादा आती है, वहीं हैंगिंग ब्रिज अपेक्षाकृत कम समय और कम खर्च में तैयार हो जाता है. इसमें पानी के अंदर भारी निर्माण कार्य नहीं करना पड़ता, जिससे मजदूरी, मशीनरी और सामग्री तीनों पर होने वाला खर्च कम हो जाता है. खासकर दूरदराज और पहाड़ी इलाकों में जहां संसाधन पहुंचाना मुश्किल होता है, वहां यह तरीका ज्यादा बेहतर माना जाता है.

सबका संदेश

2004 से पत्रकारिता से जुड़े,2010 से भारत सरकार अखबार संपादक, पत्रकार संघ जिलाध्यक्ष 2019,25से अब तक, 2011 से समाज के जिलाध्यक्ष अब तक

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