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शहरीकरण के बावजूद बैरियर द्वीप को अपना घर बना रहे गुबरैला

  • केरल के बैरियर आइलैंड पर डंग बीटल (गुबरैला) के व्यवस्थित सर्वे में 29 प्रजातियों के कुल 20,927 कीटों का पता चला।
  • तेजी से शहरीकरण के बावजूद इन द्वीपों पर गुबरैला की विविधता उम्मीद से कहीं ज्यादा थी।
  • हालांकि, शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि शहरी विस्तार, आवासों के बंट जाने, बाढ़ और जलवायु से जुड़े दबाव अभी भी इन नाजुक द्वीपीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं।

बैरियर द्वीप (Barrier island) समुद्र और मुख्य भूमि (मैनलैंड) के बीच स्थित जमीन की वह संकरी पट्टियां होती हैं, जो ज्वार-भाटा और हवाओं की क्रिया से लगातार बनती और बदलती रहती हैं। ये द्वीप तटीय क्षेत्रों को समुद्री तूफानों और ऊंची लहरों से बचाते हैं, खास जैविक समुदायों को पनाह देते हैं और पोषक तत्वों के चक्र में अहम भूमिका निभाते हैं। एक नए अध्ययन में केरल की ऐसी ही एक बैरियर द्वीप प्रणाली में डंग बीटल, जिन्हें आम बोलचाल में गुबरैला कहा जाता है, पर शोध किया गया। ये कीट पारिस्थितिक तंत्र को बेहतर ढंग से चलाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं।

गुबरैला गोबर को विघटित करने और उसे मिट्टी में दबाने का काम करते हैं। इससे मिट्टी में पोषक तत्वों का चक्रण होता है। इससे हवा और पानी के प्रवाह में सुधार से बीजों का फैलाव आसान होता है और परजीवी व रोगों का प्रकोप कम होता है। वाइपिन-कदमक्कुडी बैरियर द्वीप प्रणाली (वीकेबीआईएस) में किया गया यह अध्ययन बड़ी उपलब्ध है, क्योंकि इसमें उष्णकटिबंधीय बैरियर द्वीप में गुबरैलों पर व्यवस्थित शोध किया गया है। यह केरल में गुबरैला का पहला शुरुआती दस्तावेजीकरण है और इस बैरियर द्वीप प्रणाली में इनकी उप-प्रजाति स्काराबैइनी पर केंद्रित पहला अध्ययन है।

केरल में निर्मला कॉलेज (ऑटोनॉमस) की प्राणी विज्ञान विभाग की सदस्य और इस अध्ययन की मुख्य लेखिका चित्रा राजगोपाल और कहती हैं, “अध्ययन की रूपरेखा बनाते समय, हमें उम्मीद थी कि द्वीप जैसी जगह होने के कारण प्रजातियों की बनावट में स्पष्ट अंतर दिखेगा। हमें कुछ नई प्रजातियां मिलने की उम्मीद भी थी। हमें यह भी लग रहा था कि यहां प्रजातियों की विविधता और संख्या कम होगी, क्योंकि यह इलाका घनी आबादी वाला है और यहां शहरीकरण की रफ्तार भी तेज है।” “लेकिन, वीकेबीआईएस गुबरैला के लिए हैरानी की हद तक बेहतरीन आवास साबित हुआ; यहां प्रजातियों की विविधता कई अन्य पारिस्थितिकी तंत्रों के बराबर या उनसे भी ज़्यादा पाई गई।”

द्वीपों का शहरीकरण

वाइपिन-कदमक्कुडी बैरियर द्वीप प्रणाली केरल में कोच्चि के पश्चिमी तट पर स्थित है। इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने इसके दो उप-तंत्रों से नमूने लिए- वाइपिन आइलैंड (जो मुख्य भूमि एर्नाकुलम को अरब सागर से अलग करने वाला बैरियर आइलैंड है) और कदमक्कुडी लैगून आइलैंड क्लस्टर (जो वाइपिन और मुख्य भूमि के बीच स्थित है)। कोच्चि से इन द्वीपों को जोड़ने वाले नए पुलों के निर्माण से इनका मुख्य भूमि से संपर्क लगातार बढ़ता जा रहा है। इस वजह से यह द्वीप प्रणाली धीरे-धीरे स्वतंत्र द्वीपीय पारिस्थितिकी तंत्र के बजाय मुख्य भूमि के हिस्से की तरह काम करने लगी है।

नमूने इकट्ठा करने का काम 2019 और 2021 के बीच किया गया, लेकिन कोविड-19 की पाबंदियों की वजह से 2020 में बहुत कम नमूने जमा हो पाए। गुबरैला का सर्वेक्षण गोबर-चारे वाले पिटफॉल ट्रैप की मदद से किया गया। इसके लिए जमीन की सतह पर प्लास्टिक के बर्तन गाड़े गए, जिनमें गाय का गोबर आकर्षक चारे के रूप में रखा गया। नमूनों को सुरक्षित रखने के लिए इनमें नमक और साबुन का घोल भी डाला गया। इन ट्रैप को सूखने और बारिश में बह जाने से बचाने के लिए ऊपर से ढका गया था। इन ट्रैप को दोनों उप-तंत्रों में घास के मैदान, घरों के पीछे के खुले क्षेत्र, कृषि भूमि, छोड़े गए भूखंड और खेल के मैदान जैसे अलग-अलग प्रकार के आवासों में कम-से-कम 100 मीटर की दूरी पर लगाया गया। नमूना संग्रह सूखे और नमी वाले दोनों मौसमों में किया गया तथा हर मौसम में दो बार सर्वेक्षण किया गया। पूरे अध्ययन के दौरान कुल 480 ट्रैप लगाए गए।

अध्ययन के दौरान नमूना इकट्ठा करने में कई चुनौतियां आईं। गोबर की व्यवस्था करना, ट्रैप के लिए जरूरी चीजें को एक जगह से दूसरी जगह तक पहुंचाना और अलग-अलग स्थानों के बीच आवाजाही अक्सर मुश्किल और समय लेने वाली थी, क्योंकि क्षेत्र में संपर्क व्यवस्था सीमित थी और सड़कें संकरी थी। इसके अलावा, परिदृश्य के बंटे होने और बहुत ज्यादा शहरीकरण होने से सर्वे स्थल को चुनना भी जटिल था। केरल में सेंट जेवियर कॉलेज फॉर वूमन (स्वायत्त) के प्राणी विज्ञान विभाग की शोधकर्ता अनु एंटो कहती हैं, “मैदान में लगाए गए ट्रैप को अक्सर लोगों, पशुओं या अन्य जानवरों से नुकसान होता था, जिससे सभी जगहों पर एक जैसी परिस्थितियां बनाए रखना मुश्किल हो जाता था। उष्णकटिबंधीय जलवायु ने भी अतिरिक्त चुनौतियां पैदा कीं। खास तौर पर बारिश के मौसम में भारी बारिश, ज्यादा नमी और जलभराव जैसी स्थितियों ने काम को प्रभावित किया। स्थानीय समुदायों से अनुमति हासिल करना और उनका सहयोग पक्का करना भी बड़ी चुनौती थी।”

दिन और रात में सक्रिय रहने वाली प्रजातियों के बीच फर्क करने के लिए हर 12 घंटे में ट्रैप की जांच की जाती थी। जमा किए गए गुबरैला को छानने और तैरने के तरीकों से निकाला गया, फिर उन्हें इथेनॉल में सुरक्षित रखकर उनकी पहचान की गई।

गुबरैला को इस आधार पर बांटा गया कि वे गोबर का इस्तेमाल किस तरह करते हैं— ड्वेलर (जो गोबर में रहते हैं), टनलर (जो उसमें सुरंग बनाते हैं) और रोलर (जो गोला बनाते हैं)। दिन और रात के समय इकट्ठा किए गए कीड़ों की गतिविधियों के पैटर्न की तुलना करके उनका विश्लेषण किया गया। जिन प्रजातियों में दोनों समय के बीच कोई खास अंतर नहीं दिखा, उन्हें ‘सामान्य’ माना गया, जबकि बाकी को मुख्य रूप से दिन में सक्रिय या रात में सक्रिय (नॉक्टर्नल) कीटों के तौर पर अलग-अलग किया गया।

इस अध्ययन में इकोलॉजिकल मेट्रिक का इस्तेमाल करके विविधता का भी आकलन किया गया, जिसमें प्रजातियों की संख्या, विविधता सूचकांक, मौसमी बदलाव और अलग-अलग मौसमों में समुदायों की समानता या अंतर शामिल थे।

दबाव के बावजूद विविधता

इस अध्ययन में 29 प्रजातियों के कुल 20,927 गुबरैला पाए गए। इनमें ‘ओन्थोफैगस सर्वस’ प्रजाति सबसे अधिक थी जो करीब 40 फीसदी थी। दो प्रजातियां—’कैथार्सियस पिथेसियस’  और ‘डिजिटोनथोफैगस बोनासस’ केरल में पहले कभी नहीं देखी गईं थी। जो प्रजातियां पाई गईं, उनमें अधिकतर टनलर थीं, जबकि कुछ प्रजातियां वहीं ड्वेलर थीं। रोलर प्रजातियां बिल्कुल भी नहीं मिलीं।

कुल मिलाकर, प्रणाली में गुबरैला की विविधता औसत रही और नमूनों के अनुमानों से पता चला कि सर्वे में बीकेबीआईएस में मौजूद लगभग सभी प्रजातियों को शामिल कर लिया गया था।

निर्मला कॉलेज के प्राणी विज्ञान विभाग के सदस्य और इस अध्ययन में सह-शोधकर्ता के.वी. विनोद कहते हैं, “इस अध्ययन से सबसे अहम बात यह पता चली है कि तेजी से शहरीकरण के बावजूद ट्रॉपिकल बैरियर आइलैंड, खराब या कम प्रजातियों वाले इलाकों के बजाय, बहुत हद तक जैव-विविधता के मजबूत केंद्र हो सकते हैं।”

मौसम के हिसाब से देखें तो सूखे महीनों में गुबरैला ज्यादा संख्या और विविधता में पाए गए। हालांकि, अध्ययन की पूरी अवधि के दौरान सभी 29 प्रजातियां देखी गईं। यह उन पैटर्न से अलग है जो अक्सर दूसरी जगहों पर देखे जाते हैं, जहां आम तौर पर बारिश के मौसम में गुबरैला की विविधता अधिक होती है।

गतिविधि के आधार पर रात में सक्रिय प्रजातियों का प्रभुत्व पाया गया। इसके बाद दिन में सक्रिय प्रजातियों की संख्या थी। वहीं, दोनों समय सक्रिय रहने वाली सामान्य प्रजातियां बहुत कम देखी गईं। यह पैटर्न सभी मौसमों में लगभग एक जैसा रहा। हालांकि, कुछ प्रजातियों ने मौसमी परिस्थितियों के अनुसार अपनी गतिविधियों का समय बदला और दिन तथा रात के बीच अपनी सक्रियता में बदलाव दिखाया

फैलाव का तरीका

लेकिन ऐसे द्वीपों पर ये कीट किस तरह पहुंचते हैं और वहां कैसे टिके रहते हैं? शोधकर्ताओं का कहना है कि इनका फैलाव मुख्य रूप से उड़कर ही होता है। राजागोपाल कहती हैं, “अधिकतर गुबरैला प्रजातियों के फैलने का मुख्य जरिया उड़ना ही है। इनमें से कई बहुत अच्छी तरह उड़ सकते हैं और काफी दूर से ही गोबर का पता लगा लेते हैं, जिससे वे बैरियर आइलैंड जैसे अलग-थलग इलाकों में भी बस पाते हैं।”

साथ ही, यहां पाई गईं कई प्रजातियां आकार में छोटी हैं, जिससे उनकी लंबी दूरी तक फैलने की क्षमता सीमित हो सकती है। वह आगे कहती हैं, “इसके बावजूद, प्रसार में कुछ दूसरे रास्ते भी मदद कर सकते हैं। इनमें बहकर आने वाली वनस्पति के जरिए होने वाला निष्क्रिय परिवहन, जानवरों की आवाजाही और पशुधन, मिट्टी और जैविक पदार्थों की एक स्थान से दूसरे स्थान तक आवाजाही जैसी मानव गतिविधियां भी शामिल हैं। इन तरीकों से गुबरैला या उनके लार्वा भी नए क्षेत्रों तक पहुंच सकते हैं।”

वीकेबीआईएस जैसे इलाके में जहां द्वीप रोजाना इंसानों और जानवरों की आवाजाही के जरिए मुख्य भूमि से गहराई से जुड़े हुए हैं, वहां ये रास्ते आपस में मिल सकते हैं।

चूंकि, इस अध्ययन में द्वीप और मुख्य भूमि की प्रणाली की सीधे तौर पर तुलना नहीं की गई है, इसलिए यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि ये समुदाय एक-दूसरे से कैसे अलग हैं। एंटो कहती हैं, “लेकिन उम्मीद है कि द्वीप पर मौजूद जीवों के ऐसे समूह उन प्रजातियों का एक हिस्सा होंगे जो इन हालात में फैलने और टिके रह सकते हैं।”

ये आबादियां यह बताती हैं कि प्रजातियां मानव हस्तक्षेप से बदले और बंटे हुए परिदृश्यों में भी किस प्रकार जीवित रह सकती हैं। साथ ही, वे पोषक तत्वों की रीसाइक्लिंग, मिट्टी में वायु प्रवाह और बीजों के प्रसार जैसी अहम पारिस्थितिकी भूमिकाएं निभाने की क्षमता भी बनाए रखती हैं।

कई प्रजातियों का घर

अध्ययन से पता चलता है कि दबाव के बावजूद वीकेबीआईएस में गुबरैला की बड़ी आबादी मौजूद है। हालांकि, टनल बनाने वाले कीटों की ज्यादा संख्या और गोला बनाने वाले कीटों की अनुपस्थिति यह बताती है कि इस समुदाय का ढांचा सीमित है। यह प्रणाली अभी भी कमजोर स्थिति में है।

सबका संदेश

2004 से पत्रकारिता से जुड़े,2010 से भारत सरकार अखबार संपादक, पत्रकार संघ जिलाध्यक्ष 2019,25से अब तक, 2011 से समाज के जिलाध्यक्ष अब तक

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