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फलदार पेड़ पुत्र बरोबर होथे।” – माता श्यामा देवी

आज से लगभग एक शताब्दी पहले वर्तमान मुंगेली क्षेत्रांतर्गत शीतलकुंडा नामक गाँव अपनी एक अलग पहचान रखता था। यह गाँव प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर था, किंतु वर्षों तक सूखे और पेयजल संकट से जूझता रहा। धरती की गर्भगृह से जहाँ भी पानी निकाला जाता, वह खारा पानी ही होता था। पेयजल को लेकर गाँव के लोगों का जीवन कठिनाइयों से भरा था, फिर भी वे परिश्रम, आपसी सहयोग और परंपराओं के सहारे अपना सुखद जीवन व्यतीत करते थे।

आज भी शीतलकुंडा में दसरू मालगुजार का वंशज निवास करता है। दसरू सतनामी का पुत्र लालाराम हुए और लालाराम के पुत्र जीवराखन, मनराखन और त्रिभुवन थे।

माता श्यामा देवी अपने समय से बहुत आगे की सोच रखने वाली, दूरदर्शी, संवेदनशील और समाजसेवी महिला थीं। वे केवल अपने परिवार तक सीमित नहीं थीं, बल्कि वर्तमान बिलासपुर, मुंगेली और कबीरधाम जिला क्षेत्रान्तर्गत की महिलाओं को स्वच्छता, अच्छी संस्कृति और फैमिली केयरिंग जैसे विषयों पर जागरूक करती थीं। साथ ही वे समाज में व्याप्त समकालीन कुरीतियों के विरुद्ध महिलाओं को संगठित कर सकारात्मक परिवर्तन का संदेश देती थीं।

माता श्यामा देवी के पाँच पुत्र हुए —सालिक राम, मालिक राम, आजू राम, इंद्र कुमार और रेखा राम। उन्होंने अपने बच्चों को केवल परिवार का उत्तराधिकारी नहीं बनाया, बल्कि प्रकृति, समाज और संस्कारों के प्रति उत्तरदायी बनने की शिक्षा भी दी।

शीतलकुंडा में पानी की समस्या वर्षों पुरानी थी। मालगुजार और उनके पूर्वजों ने अनेक बार कुएँ खुदवाए, परंतु हर बार खारा पानी ही प्राप्त हुआ। अंततः लगभग वर्ष 1925-30 के बीच परिवार ने एक और कुआँ खुदवाने का निश्चय किया। इस बार उन्होंने मीठे पानी की आशा में एक विद्वान पंडित को बुलाया, ताकि शुभ स्थान का चयन किया जा सके।

पंडित ने भूमि का निरीक्षण कर बताया कि बाड़ी में स्थित मुनगा के पेड़ के नीचे कुआँ खोदा जाए, वहाँ मीठा पानी अवश्य मिलेगा। मोहल्ले के लोगों ने भी इस सुझाव का समर्थन किया। भूमिपूजन की तैयारी पूरी हो गई और सभी उत्साहित थे।

उन दिनों माता श्यामा देवी दसरू मालगुजार के वंशज में नवविवाहिता बहू बनकर आईं थीं। उन्होंने सबकी बातें शांतिपूर्वक सुनीं, फिर अत्यंत विनम्रता और दृढ़ता से अपनी असहमति व्यक्त की। उन्होंने कहा बाबूजी — “खारा पानी तो का, हम करू पानी घलो पी लेबोन फेर मुनगा पेड़ नई काटन देबो।” और फिर उन्होंने अपने विचार का आधार बताते हुए कहा था कि “फलदार पेड़ हमर पुत्र बरोबर होथे।” उनके इन शब्दों ने वहाँ उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति को सोचने पर विवश कर दिया। उन्होंने समझाया कि यदि मीठे पानी के लिए एक फलदार और जीवनदायी वृक्ष को काट दिया गया, तो भविष्य की पीढ़ियाँ प्रकृति की इस अमूल्य धरोहर से वंचित हो जाएँगी। उन्होंने कहा कि समस्या का समाधान ऐसा होना चाहिए जिससे प्रकृति भी सुरक्षित रहे और समाज का भी कल्याण हो।

इसके बाद माता श्यामा देवी ने उसी बैठक में एक नया प्रस्ताव रखा—गाँव में एक तालाब खुदवाया जाए, ताकि वर्षा का जल संग्रहित हो सके और पूरे गाँव को स्थायी जलस्रोत प्राप्त हो। इससे न सिर्फ हम इंसान बल्कि पशुपक्षी भी जीवन पाएंगे। उनका सुझाव केवल तत्कालीन संकट का समाधान नहीं था, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक दूरदर्शी योजना थी।

गाँव के सभी लोगों ने उनके प्रस्ताव का शत-प्रतिशत समर्थन किया। मालगुजार अपनी बहु की बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता से अत्यंत गौरवान्वित हुए। उन्होंने तत्काल गाँव में तालाब खुदवाने का निर्णय लिया।

तालाब का निर्माण पूर्ण होने के बाद जैतखाम की स्थापना करते हुए पर्वत दान और विशालकाय भंडारा का आयोजन किया गया। कुछ ही समय बाद वर्षा ऋतु आई और तालाब वर्षा के जल से लबालब भर गया। उनके पुण्य प्रताप से ही माता श्यामा देवी को प्रथम पुत्र के रूप में सालिक राम की प्राप्ति हुई।

माता श्यामा देवी यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने गाँव की महिलाओं को संगठित किया और सभी के साथ मिलकर तालाब के चारों ओर अनेक वृक्ष लगाए। तालाब और वृक्षों ने मिलकर गाँव के वातावरण को शीतल बनाया, भूजल स्तर को बढ़ाया और अनेक जीव-जंतुओं के लिए भी नया आश्रय तैयार किया। धीरे-धीरे शीतलकुंडा केवल एक गाँव नहीं रहा, बल्कि प्रकृति संरक्षण, जल-संरक्षण और सामुदायिक भागीदारी का प्रेरणास्रोत बन गया। माता श्यामा देवी ने अपने जीवन से यह सिद्ध कर दिया कि सच्चा विकास वही है जिसमें मनुष्य और प्रकृति दोनों का सम्मान हो।

आज, जब जल संकट, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक जागरूकता जैसे विषय पूरे विश्व के लिए चुनौती बने हुए हैं, तब माता श्यामा देवी का यह निर्णय और उनके अमूल्य संदेश आज भी प्रासंगिक है।
(1) “खारा पानी तो का, हम करू पानी घलो पी लेबोन फेर मुनगा पेड़ नई काटन देबो।”
(2) “फलदार पेड़ पुत्र बरोबर होथे।”

उनका जीवन हमें सिखाता है कि दूरदर्शिता, प्रकृति-प्रेम, महिला नेतृत्व और सामूहिक प्रयास से किसी भी कठिनाई का स्थायी समाधान संभव है। शीतलकुंडा का तालाब केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि माता श्यामा देवी की संवेदनशील सोच, पर्यावरण संरक्षण और लोककल्याण की अमर विरासत का जीवंत प्रतीक है।

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