धर्म

होलिका दहनः एक स्मरण

. होलिका दहनः एक स्मरण

अपनी गोदी में जो जलाएँ, अपने ही संतानों को।
होलिका का रूप वही हैं, पूछो मत अंजानों को।।

ईर्ष्या-धूम में आँख जले, मन हो जाता काला है।
फिर कहते हैं भाग्य बुरा है, जग सारा ही ज्वाला है।।

प्रह्लाद की भूल यही थी-हरि-नाम जपते जाते।
सत्ता के मद में डूबे जन, सच को कैसे सह पाते?

निर्दोषों पर क्रोध बरसता, यह कैसी अभिलाषा है!
हिरण्यकश्यप हर घर बैठे-बस बदली परिभाषा है।।

जो निज पुत्र न अपना पाए, जग का हित क्या साधेगा?
वंश-वृक्ष की जड़ ही सूखी, फल किस डाली बाँधेगा?

स्तंभ-स्तंभ में सत्य खड़ा है, पर हम देख न पाते हैं|
नरसिंह बाहर ढूँढ रहे हैं, भीतर क्यों न आते हैं?

होली आई, दहन हुआ-पर मन का दाह न जल पाया।
प्रह्लाद-भाव बिसरा बैठे, बस रंगों ने छल खाया।।

हम होलिका तो जला रहे, पर जलन न हृदय से जाती।
प्रह्लाद-भाव भुला बैठे, बस फूहड़ वाणी गाती।।

आओ इस होली संकल्प लें-
अंतर की होलिका जल जाए,
प्रह्लाद-सा निष्कपट विश्वास
हर श्वास-श्वास में पल जाए।। ऋचा चंद्राकर 'तत्वाकांक्षी'

सबका संदेश

2004 से पत्रकारिता से जुड़े,2010 से भारत सरकार अखबार संपादक, पत्रकार संघ जिलाध्यक्ष 2019,25से अब तक, 2011 से समाज के जिलाध्यक्ष अब तक

Related Articles

Back to top button