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।चीन की नींद उड़ना तय, एक और बड़ी डील क्रैक करेगा भारत, सुपरपावर समझौते से बदलेगा खेल

भारत चिली के साथ एक बड़े फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर बातचीत कर रहा है. इससे उसे लिथियम, कॉपर, कोबाल्ट और मोलिब्डेनम जैसे जरूरी मिनरल्स तक लंबे समय तक एक्सेस मिल सकता है. ये एलिमेंट इलेक्ट्रिक गाड़ियों, इलेक्ट्रॉनिक्स और क्लीन एनर्जी के लिए जरूरी हैं.

ग्लोबल मंच पर लगातार अपनी आर्थिक और कूटनीतिक ताकत बढ़ाते हुए भारत अब एक और बड़े समझौते के साथ सुर्खियों में है. मदर और फादर डील के बीच भारत ने दक्षिण अमेरिकी देश Chile के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट को आगे बढ़ाने की दिशा में अहम कदम उठाया है. जहां इंडिया-US ट्रेड फ्रेमवर्क और लंबे समय से पेंडिंग EU-इंडिया ट्रेड डील जैसी हाई-प्रोफाइल ट्रेड बातचीत हेडलाइन में बनी हुई है. वहीं, एक और फ्री ट्रेड एग्रीमेंट चुपचाप बन रहा है. इससे इंडिया को एक बड़ा स्ट्रेटेजिक फायदा मिल सकता हैपब्लिक डिबेट की चकाचौंध से दूर इंडिया चिली के साथ एक बड़े ट्रेड पैक्ट पर बातचीत के एडवांस्ड स्टेज में है. चिली एक ऐसा देश है जिसके पास दुनिया के कुछ सबसे कीमती लिथियम और दूसरे जरूरी मिनरल्स का रिजर्व है. ऐसे समय में जब जरूरी मिनरल्स और रेयर अर्थ्स तक पहुंच एक जियोपॉलिटिकल लीवर और ग्लोबल पावर पॉलिटिक्स में एक हथियार भी बन गई है. ये चिली FTA इंडिया के मैन्युफैक्चरिंग एम्बिशन और स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी को सपोर्ट करने वाला एक जरूरी पिलर बन सकता है. 

इंडिया के लिए चिली क्यों जरूरी है? 

आज की ग्लोबल इकॉनमी में जरूरी मिनरल्स अब सिर्फ इंडस्ट्रियल इनपुट नहीं रह गए हैं, बल्कि स्ट्रेटेजिक एसेट भी हैं. लिथियम, कॉपर, कोबाल्ट, रेनियम और मोलिब्डेनम इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिक गाड़ियों, रिन्यूएबल एनर्जी सिस्टम और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग के लिए जरूरी हैं. भारत और चिली के बीच पहले से ही एक प्रेफरेंशियल ट्रेड एग्रीमेंट लागू है. लेकिन अब दोनों देश इसे व्यापक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट में बदलने पर काम कर रहे हैं. 

प्रेफरेंशियल ट्रेड से बड़ी डील तक….. 

भारत और चिली फिर शुरू से शुरू नहीं कर रहे हैं. दोनों देशों ने 2006 में एक प्रेफरेंशियल ट्रेड एग्रीमेंट लागू किया था. हालांकि, मौजूदा बातचीत का मकसद टैरिफ रियायतों से कहीं आगे जाना है. ये प्रस्तावित कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट कोऑपरेशन का दायरा बढ़ाने और इकोनॉमिक इंटीग्रेशन को गहरा करने के लिए बनाया गया है. गुड्स ट्रेड के अलावा CEPA डिजिटल सर्विसेज, इन्वेस्टमेंट प्रमोशन और कोऑपरेशन, MSMEs और सबसे जरूरी मिनरल्स को कवर करना चाहता है. ये विस्तार ट्रांजैक्शनल ट्रेड से भविष्य की इकोनॉमिक और टेक्नोलॉजिकल प्रायोरिटीज के साथ जुड़ी स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप में बदलाव को दिखाता है.

इस डील की बातचीत लगभग पूरी होती दिख रही है. कॉमर्स और इंडस्ट्री मिनिस्टर पीयूष गोयल ने पिछले महीने कहा था कि भारत और चिली के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट के लिए बातचीत जल्द ही पूरी हो जाएगी. गोयल ने इस बात पर जोर दिया था कि इस समझौते से भारतीय बिजनेस के लिए जरूरी मिनरल्स तक पहुंच खुल जाएगी. उन्होंने ये भी कहा कि भारत फ्री ट्रेड एग्रीमेंट के लिए कई डेवलप्ड देशों के साथ एक्टिव बातचीत कर रहा है. चिली समझौते को एक बड़ी ट्रेड और इंडस्ट्रियल स्ट्रैटेजी का हिस्सा बनाया जा रहा है.

भारत और चिली के बीच बाइलेटरल ट्रेड

स्ट्रेटेजिक लॉजिक के बावजूद भारत और चिली के बीच बाइलेटरल ट्रेड मामूली बना हुआ है. 2024-25 में चिली को भारत का एक्सपोर्ट 2.46 परसेंट घटकर $1.15 बिलियन हो गया है. जबकि चिली से इंपोर्ट तेजी से बढ़ा है. ये 72 परसेंट बढ़कर $2.60 बिलियन हो गया है. ये इम्बैलेंस कच्चे माल के सप्लायर के तौर पर चिली की भूमिका और भारत के लिए वैल्यू चेन में ऊपर जाने के मौके को दिखाता है.

क्या है इस डील का मकसद?

 इंडिया-चिली फ्री ट्रेड एग्रीमेंट का मकसद लिथियम, कॉपर और कोबाल्ट जैसे जरूरी मिनरल्स के लिए चीन पर भारत की निर्भरता कम करना है. इससे बीजिंग के सप्लाई चेन पर असर को सीधे चुनौती मिलेगी. 

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