छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़: वेतन को लेकर धरना के दौरान मिड-डे मील की दो रसोइयों की मौत, आंदोलन और तेज़

दिल्ली: छत्तीसगढ़ में मिड-डे मील रसोइयों द्वारा बेहतर वेतन और नौकरी की सुरक्षा की मांग को लेकर चल रहा अनिश्चितकालीन आंदोलन एक दुखद मोड़ पर पहुंच गया है. आंदोलन के दौरान दो महिला रसोइयों की मौत हो गई है, जिससे सरकार पर दबाव और बढ़ गया है.

इस बीच, राज्य सरकार ने मंगलवार को इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि मौतों का आंदोलन से कोई सीधा संबंध नहीं है और इस तरह के दावे भ्रामक हैं.

मील बनाने वाली रसोइया थीं और कई ज़िलों में चल रहे विरोध प्रदर्शनों में सक्रिय रूप से हिस्सा ले रही थीं. ये प्रदर्शन लंबे समय से कम वेतन और असुरक्षित कामकाजी हालात की ओर ध्यान खींचने के लिए किए जा रहे थे.

पहली मृतक, दुलारी यादव, बेमेतरा ज़िले के बेरला ब्लॉक के सलधा गांव स्थित शासकीय प्राथमिक शाला में रसोइया के रूप में कार्यरत थीं. उन्होंने 29 दिसंबर 2025 को छत्तीसगढ़ स्कूल मिड-डे मील रसोइया संघ के साथ आंदोलन में भाग लेना शुरू किया था. धरना-प्रदर्शन के दौरान उनकी तबीयत बिगड़ गई, जिसके बाद 25 जनवरी 2026 को उन्हें रायपुर के डॉ. भीमराव आंबेडकर स्मृति अस्पताल में भर्ती कराया गया. बाद में उन्हें एक निजी अस्पताल रेफर किया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई.

दूसरी महिला रसोइया, रुकमनी सिन्हा, बालोद ज़िले के डोंडी ब्लॉक के कुसुमकसा गांव की रहने वाली थीं. उनकी भी आंदोलन में भाग लेते समय मौत हो गई. इन दोनों मौतों ने सरकार की प्रतिक्रिया और रसोइयों की लंबे समय से चली आ रही मांगों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

संघ के अध्यक्ष रामराज ने बताया कि दोनों महिलाएं बेहतर वेतन, सेवाओं के नियमितीकरण और सामाजिक सुरक्षा लाभों की मांग को लेकर चल रहे लगातार धरने का हिस्सा थीं. उन्होंने आरोप लगाया कि कई हफ्तों से आंदोलन चलने और रसोइयों की स्थिति लगातार खराब होने के बावजूद राज्य सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया.

संघ के अनुसार, रसोइया बेहद कठिन परिस्थितियों और ठंड के मौसम में भी धरना जारी रखे हुए थीं और माना जा रहा है कि इन्हीं हालात ने इन मौतों में भूमिका निभाई.

छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील बनाने वाली कई रसोइया रोज़ाना हजारों बच्चों के लिए भोजन तैयार करती हैं, लेकिन उन्हें मात्र 66 रुपये प्रतिदिन मिलते हैं, जो दिहाड़ी मज़दूरों की मज़दूरी से भी कम है. अधिकांश रसोइयों के पास न तो स्वास्थ्य बीमा है और न ही पेंशन जैसी बुनियादी सुविधाएं, जिससे उनकी नौकरी की असुरक्षा और भी बढ़ जाती है.

एक संघ सदस्य ने कहा, ‘हमारी साथियों की मौत मिड-डे मील रसोइयों के संघर्ष की दर्द को याद दिलाती है, जो बेहद कम वेतन पर गुज़ारा करती हैं. इसके बावजूद सरकार हमें लगातार नज़रअंदाज़ कर रही है. दोनों की मौत ठंड के दुष्प्रभावों से हुई है.’

मांगें और तेज हुई

मौतों की संख्या बढ़ने से मज़दूर संगठनों और नागरिक समाज समूहों की ओर से सरकार से हस्तक्षेप और पीड़ित परिवारों को मुआवज़ा देने की मांग तेज हो गई है. आंदोलनकारी सभी मिड-डे मील रसोइयों के लिए वेतन बढ़ाने, सेवाओं के नियमितीकरण और सामाजिक सुरक्षा की मांग कर रहे हैं.

छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से अब तक इन मौतों या आगे उठाए जाने वाले कदमों को लेकर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है.

यह आंदोलन रोज़ाना मात्र 66 रुपये की बेहद कम मज़दूरी के खिलाफ शुरू हुआ था, जिसे रसोइयों ने सम्मानजनक जीवन के लिए अपर्याप्त बताया है.

पीएम-पोषण योजना के तहत कार्यरत रसोइयों के तीन हफ्तों से अधिक समय से चल रहे अनिश्चितकालीन धरने के कारण कई सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील सेवाएं बाधित हैं. आंदोलनकारी बढ़े वेतन वृद्धि और बेहतर कार्य स्थितियों की मांग पर अड़े हुए हैं.

मौतों का आंदोलन से कोई सीधा संबंध नहीं है: सरकार

लोक शिक्षण संचालनालय (डीपीआई) ने मंगलवार देर रात एक विस्तृत स्पष्टीकरण जारी कर नवा रायपुर के टुटा धरनास्थल पर चल रहे आंदोलन से मौतों को जोड़ने के दावों को सिरे से खारिज कर दिया.

 की   डीपीआई ने कहा कि हड़ताली रसोइयों के प्रतिनिधियों के साथ उनकी और स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव की बैठक हुई थी, जिसमें सरकार ने रसोइयों के मानदेय में 25 प्रतिशत की वृद्धि – यानी 500 रुपये की बढ़ोतरी – का निर्णय बताया और उनसे हड़ताल समाप्त कर घर लौटने की अपील की थी.

विभाग ने कहा कि इसके बावजूद कुछ रसोइयों ने आंदोलन जारी रखने का फैसला किया.

दोनों मौतों को लेकर डीपीआई ने कहा है कि बालोद ज़िले की रसोइया 20 और 21 जनवरी को ही धरने में शामिल हुई थीं और उसके बाद घर लौट गई थीं. बाद में उन्हें दल्लीराजहरा के एक सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई. दूसरी रसोइया पहले से ही एक गंभीर बीमारी से पीड़ित थीं और भिलाई के एक निजी अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था, जहां उनकी मृत्यु हुई.

डीपीआई ने दावा किया, ‘दोनों रसोइयों की मौत का आंदोलन या हड़ताल से कोई सीधा संबंध नहीं है.’

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