भारत का ‘इंडिया फर्स्ट’ रुख: रणनीतिक तेल भंडार नहीं होंगे जारी, ऊर्जा सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण वैश्विक तेल बाजार में उथल-पुथल के बीच भारत ने अंतरराष्ट्रीय प्रयासों से दूरी बनाते हुए अपने रणनीतिक तेल भंडार जारी करने से इनकार कर दिया है। सरकारी सूत्रों के अनुसार भारत अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आइईए) के उस प्रस्ताव में शामिल नहीं होगा, जिसमें तेल और गैस कीमतों को बढ़ने से रोकने के लिए आपातकालीन तेल भंडार जारी करने पर विचार किया जा रहा है।सूत्रों ने कहा कि सरकार की नीति “इंडिया फर्स्ट” है और मौजूदा संकट भारत ने पैदा नहीं किया है, इसलिए भंडार का उपयोग केवल आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में किया जाएगा। भारत के पास 5.33 मिलियन टन क्षमता वाले रणनीतिक भंडार हैं, जिनमें अभी लगभग 80 प्रतिशत तेल भरा हुआ है।
उधर, जी-7 देशों के वित्त मंत्रियों ने बाजार को स्थिर करने के लिए भंडार जारी करने पर सोमवार को चर्चा की, लेकिन इस पर अंतिम सहमति नहीं बन पाई।
देश में पेट्रोल, डीजल और विमान ईंधन का पर्याप्त भंडार
सरकारी सूत्रों ने स्पष्ट किया कि देश में पेट्रोल, डीजल और विमान ईंधन (एटीएफ) का पर्याप्त भंडार है और निर्यात पर किसी प्रकार की रोक लगाने की योजना नहीं है। यदि कच्चे तेल की कीमत 130 डालर प्रति बैरल से ऊपर नहीं जाती, तो घरेलू ईंधन कीमतों में वृद्धि की संभावना भी कम है।ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए भारत ने रूसी तेल की अतिरिक्त खेप खरीदने के साथ-साथ अमेरिका और कनाडा से अतिरिक्त एलपीजी आपूर्ति की व्यवस्था भी शुरू कर दी है।
पश्चिम एशिया की स्थिति चिंताजनक- जयशंकर
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने संसद में कहा कि पश्चिम एशिया की स्थिति चिंताजनक है, लेकिन भारत ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्र में रह रहे भारतीयों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहा है।पुतिन बोले, यूरोप चाहे तो रूस सहयोग को तैयाररूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने सोमवार को कहा कि ईरान युद्ध के कारण दुनिया में ऊर्जा संकट शुरू हो गया है और स्थिति और गंभीर हो सकती है।उन्होंने चेतावनी दी कि यदि हालात बिगड़े तो होर्मुज से गुजरने वाली तेल आपूर्ति पूरी तरह ठप हो सकती है, जिससे वैश्विक उत्पादन पर बड़ा असर पड़ेगा। उन्होंने रूसी कंपनियों से मौजूदा हालात का लाभ उठाने को कहा। एक बैठक में पुतिन ने कहा कि रूस यूरोप को फिर से तेल और गैस आपूर्ति करने के लिए तैयार है। यदि यूरोपीय कंपनियां राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर दीर्घकालिक और स्थिर सहयोग चाहती हैं तो मॉस्को इसके लिए खुला है।




