जब कश्मीर मुद्दे पर ईरान ने दिया था भारत का साथ, लेकिन क्या दोनों देशों के संबंध दोस्ताना रहे हैं

भारत और ईरान नए दोस्त नहीं हैं. हमारी दोस्ती उतनी ही पुरानी है जितना इतिहास. सदियों से हमारे समाज, कला और आर्किटेक्चर, विचार और परंपराओं, संस्कृति और व्यापार के माध्यम से जुड़े हुए हैं.”
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2016 में अपनी ईरान यात्रा के दौरान यह बयान देते हुए भारत और ईरान के संबंधों की गहराई के बारे में की थी.
वैसे अगर देखा जाए तो भारत की स्वतंत्रता के बाद दोनों देशों के संबंधों में कई अहम पड़ाव आए हैं.
मध्य-पूर्व की लगातार बदलती परिस्थितियाँ, पाकिस्तान के साथ संबंध, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, अंतरराष्ट्रीय राजनीति, अमेरिका-रूस-चीन जैसे देशों का प्रभाव और ईरान के आंतरिक हालात, इन सभी ने पिछले सात-आठ दशकों में भारत और ईरान के संबंधों को प्रभावित किया है.
ईरान पर इसराइल और अमेरिका के हालिया हमलों और आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत के बाद भारत ने खुले तौर पर ईरान पर हुए हमलों की निंदा नहीं कीइतिहास के पन्नों में कुछ ऐसी घटनाएँ दर्ज हैं, जहाँ ईरान ने भारत का खुले तौर पर समर्थन किया है, तो कुछ ऐसी भी हैं जहाँ दोनों देशों ने अपने-अपने हितों को प्राथमिकता दी.पिछले दशकों में भारत और ईरान के संबंध कैसे बदले, किन मौक़ों पर ईरान ने भारत का साथ दिया और कब भारत के साथ नहीं खड़ा हुआ, इस लेख में इस पर एक नज़र.
भारत और ईरान के संबंधों के प्रमाण इंडो-आर्यन संस्कृति की शुरुआत से मिलते हैं. सब यह जानते हैं कि भारत और ईरान धर्म, संस्कृति और भाषा के स्तर पर सदियों से जुड़े हुए हैं.
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ में भारत-ईरान संबंधों पर लिखा था कि “भारतीयों के जीवन और संस्कृति को दुनिया की अनेक मानव प्रजातियों और संस्कृतियों ने प्रभावित किया है. उनमें से सबसे पुराना और सबसे मज़बूत संबंध ईरानियों के साथ रहा है.”
1946 में इलाहाबाद के दौरे पर आए ईरानी कल्चरल मिशन के प्रमुख ने कहा था, “ईरान के लोग और भारत के लोग भाइयों की तरह हैं, जो एक फ़ारसी जानकार के मुताबिक़ एक-दूसरे से बिछड़ गए थे. एक भाई पूरब में गया और दूसरा पश्चिम में.”
“दोनों के परिवार अपने बारे में सब कुछ भूल गए. अगर शायद इन दोनों में कुछ कॉमन बचा है, तो वह हैं कुछ पुराने सुर, जो कभी-कभार इनकी बांसुरी से बज उठते हैं. इसीलिए हम अपने पुराने सुरों को बजाने बार-बार भारत आते रहते हैं, ताकि हमें सुनकर हमारे चचेरे भाई हमें पहचान पाएं और हम उनके साथ फिर एक हो पाएं.”
पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1946 में प्रकाशित ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ में लिखा था, “विश्व में हो रहे परिवर्तन एशियाई देशों को एक-दूसरे को फिर से देखने के लिए मजबूर कर रहे हैं. इसमें कोई शक नहीं है कि आने वाले दौर में भारत की ईरान से नज़दीकियां बढ़ेंगी.”
भारत और ईरान ने 15 मार्च 1950 को ‘फ्रेंडशिप ट्रीटी’ पर हस्ताक्षर किए थे, जिसे दोनों देशों के कूटनीतिक संबंधों की औपचारिक शुरुआत माना जाता है. इसमें कहा गया था कि दोनों देश शांति और दोस्ती के रास्ते पर चलेंगे.
यह वह दौर था, जब विश्व अमेरिका और सोवियत यूनियन के दो ध्रुवों में बंट रहा था और भारत ने नॉन-अलाइनमेंट का रास्ता अपनाया था .
‘इंडियाज़ वेस्ट एशिया पॉलिसी: लिमिट्स ऑफ़ बाइलेटरलिज़्म’ शीर्षक से शोधपत्र में प्रो. मुमताज़ अहमद शाह लिखते हैं, “ईरान, सऊदी अरब और दूसरे राजशाही शासनों का अमेरिका सुपरपावर साथी बना हुआ था. वह पाकिस्तान और इन खाड़ी देशों के बीच सैन्य सहयोग का समर्थन कर रहा था. भारत ने ईरान, सऊदी अरब, मिस्र, सीरिया और इराक़ के साथ कूटनीतिक साझेदारी स्थापित की थी, लेकिन वह इस क्षेत्र में ऐसे सहयोगी की तलाश में था जो धर्मनिरपेक्ष मूल्यों में विश्वास रखता हो.”
वो बताते हैं, “ईरान के शाह ने 1956 में बग़दाद पैक्ट के सिर्फ़ चार महीने बाद ही भारत का दौरा किया था. उन्होंने भारत को यह आश्वासन दिया था कि ईरान के पाकिस्तान के साथ क़रीबी रिश्ते कतई भारत के ख़िलाफ़ नहीं हैं और इससे भारत और ईरान के दोस्ताना संबंधों पर कोई असर नहीं होगा.”
उसके बाद 1959 के सितंबर में नेहरू ने भी ईरान का दौरा किया और तेहरान से भारत की ‘नॉन-अलाइनमेंट पॉलिसी’ को विश्व को समझाने का किया.
भारत-ईरान संबंधों पर कुवैत और इराक़ जैसे देशों में भारत के राजनयिक रह चुके तलमीज़ अहमद से बीबीसी ने बात की.
तलमीज़ अहमद कहते हैं, “ईरान के शाह के समय में हम ऐसा कह सकते हैं कि शाह भारत के बहुत नज़दीक आना चाहते थे. हमने ‘ईरान-हिंद शिपिंग लाइन’ और ‘मेंगलुरु ऑयल रिफ़ाइनरी’ की स्थापना की. ईरान भारत को पेट्रोलियम सप्लाई करने वाला बड़ा प्लेयर बना.




