नारी: सृजन और सामर्थ्य

. नारी: सृजन और सामर्थ्य
कहते है वेद की ऋचाओं में, होता जहाँ नारी का सम्मान।
बसते है वही पर सभी देव गण, उजागर करता यह प्रमाण।।
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते”, ऋषियों का यह ज्ञान।
नारी को पूजो सदा, यही सनातन मान ।।
भोग-वस्तु मत जानिए, वह ममता की खान।
करुणा, प्रेम, पवित्रता, उसके दिव्य वरदान।।
वात्सल्यामृत से भरा, कोमल उसका नेह।
मितभाषी मधुमय हृदय, पावन उसके देह।।
अधर्म बढ़े जब जगत में, बनती महाकालि।
दुष्ट-दलन को प्रकट हो, रूप धरे विकरालि ।।
नारी गुण-अनगिन भरे, ओज-तेज की खान।
अटल पुरुषार्थों सहित, करती जग कल्याण।।
अबला उसको मत कहो, उससे जग संचार।
नारी ही नारायणी, वह जग का आधार।।
सुप्त न रहने दो इसे, शक्ति करो पहचान।
ज्यों हनुमत को बोध हुआ, जागा उनका मान।।
बीज सुप्त जो रह गया, अंकुर कैसे पाय।
वैसे सोई शक्ति भी, जीवन क्या फल लाय।।
इतिहासों में दीखती, नारी की पहचान।
राधा, मीरा, सीताजी, सावित्री सम्मान।।
नारी बन अवतरित हुई, धरती की यह शान।
जीवन-पथ दिखला गई, अपनी शुभ पहचान।। ऋचा चंद्राकर 'तत्वाकांक्षी'


