Uncategorized

सनातन संस्कृति की रक्षा हेतु शतचण्डी आराधना यज्ञ महोत्सव।

रतनपुर-  शारदीय नवरात्र पर्व के पावन अवसर पर माँ भगवती महामाया मंदिर प्रांगण रतनपुर मे शतण्डी यज्ञ सहस्त्रार्चन महोत्सव के सप्तम दिवस संबोधन में यज्ञाचार्य आचार्य श्री पंडित झम्मन शास्त्री जी महाराज ने देवी महिमा के साथ शक्ति उपासना का महत्व बताते हुए कहा जीवन में जगत जननी की कृपा के बिना जगत पिता का ज्ञान संभव नहीं होता। सांसारिक वासना की निवृत्ति के लिए मां भगवती की उपासना आवश्यक है ।आद्यशक्ति महामाया की उपासना से ही लौकिक माया के बंधन से मुक्त हो सकते हैं। इसलिए कृपा पूर्वक जगन्माता जीवमात्र के कल्याण की भावना से कई रूपों में अवतार लेकर भारत की पवित्र भूमि में लीला करती हैं ।जिनके द्वारा शक्ति प्राप्तकर ब्रम्हा, विष्णु, महेश त्रिदेव भी जगत के सृष्टी पालन और संहार कार्य मे सफल होते है । निराकार पर ब्रम्हा स्वरूपनी जगत जननी की आराधना करने की क्षमता हमारे पास नहीं है ।मां की कृपा होने पर भक्तों को साधक को उनके दिव्य शक्ति का आभास होता है। केवल साधन साध्य नही यह कृपा साध्य है। बम्लेश्वरी मां भगवती को केवल प्रेम चाहिए ।निश्चल भाव से बुद्धि और विचारों में पवित्रता हो तो सहज भाव से जीव का कल्याण केवल स्तुति प्रार्थना करने से ही हो सकता है। अपने-अपने स्वधर्म का पालन करते हुए सत्कर्मानुष्ठान सनातन वैदिक परंपरा से संपादन करें तो शीघ्र जगत पिता परमात्मा माँ भगवती प्रसन्न हो जाती है। और शक्ति और शक्तिमान तत्वतः एक ही है। भक्तानुग्रहार्थ रूप रूप में विलासित है। कथा आती है। श्री हनुमान जी महाप्रभु को मां जननी ने बहुत आशीर्वाद दी लेकिन जब उनकी श्री मुख से प्रभु राम की कृपा सदैव प्राप्त हो या आशीष प्राप्त होने पर हनुमान जी कृत्कृत्यता का अनुभव करने लगे। इसलिए सनातन संस्कृति में मां का स्थान सर्वोच्च है ।भारत सती साध्वी पतिव्रता का देश है। महाकाली ,महालक्ष्मी, महासरस्वती, मां दुर्गा, काली ,सीता ,राधा, सावित्री, पार्वती, गंगा, गायत्री ,16मातृका, चौसठ योगिनी, दस महाविद्या के रूप में प्रकट हो कर जीव मात्र को अभय प्रदान करती है ।बल्कि असुरो के संघार के लिए सदैव तत्पर रहती है। जिस देश में नारी शक्ति का सम्मान होता है ।वहां देवता भी बालक बनकर प्रकट हो जाते हैं। इसलिए हमारा भारत देश महान है ।जहां भगवान विभिन्न रुपों में अवतार लेकर लीला करते हैं। और भारतीय नारियों के शील पर कोई आघात पहुंचाने का प्रयास करता है। तो उन्हें दंड देकर उनके कुल परिवार का विध्वंस भी करा देते हैं। महाभारत और रामायण काल का इतिहास प्रमाणित है। ऐसे देश के आज माताओं के शील पर और मर्यादा पर लगातार प्रहार हो रहा है। दुर्भाग्य का विषय है ।विदेशी सभ्यता का अनुसंधान का अंधाअनुकरण कर समाज में केवल भौतिक विकास के नाम पर भयावह दिशाहीनता बढ़ी है । टी वी ,मोबाइल का दुरुपयोग कर विकृति पैदा की जा रही है। इसे रोकने के लिए सेवा, संयम ,सदाचार ,सात्वक आहार का सेवन सात्विक सत्संग ,साधना एवं भजन के प्रभाव से समाज में अधिक से अधिक यज्ञ भक्ति के द्वारा समाज मे देश में नैतिक मूल्यों की स्थापना संभव है।अध्यात्म, विज्ञान और व्यवहार के दृष्टि से। अंत में आचार्य श्री ने आधुनिक यंत्र के द्वारा कन्या भ्रुण हत्या गर्भपात को महान अपराध महापाप बताते हुए कहा। जिस देश में 9 कुमारी कन्या ,सुवासिनी का नवदुर्गा के रूप में पूजन करते हैं। उसी देश में बेटियों को गर्भ में ही हत्या करना जघन्य अपराध है। बेटी किसी भी पक्ष से कमजोर नहीं शास्त्रो में तो उन्हें 10 गुणा अधिकार अधिकार प्राप्य है ।कन्या दोनों कुल को तारती है। इसलिए उन्हें दुहिता कहा गया है। मां भगवती महामाया जैसे मधु कैटभ, महिषासुर चंड मुन्ड , शुंभ-निशुंभ जैसे दुर्गम दानवो का संहार कर आसुरिवृत्ति का दमन कर देव समाज, मानव समाज को सुखी बनाकर कल्याण की। वैसे ही आज काम, क्रोध, लोभ, मोह, छल ,कपट, दम्भ,पाखण्ड, घमंड, अभिमान , दुर्व्यसन ,इर्ष्या, द्वेष, तामस प्रदार्थों के सेवन से मुक्त दानवी प्रवृत्ति के विनाश हेतु । मां जगदंबा देवी से दैवी शक्ति प्राप्त करने की आवश्यकता है ।इसलिए नवरात्र पर्व में शतचण्डी महायज्ञ हो रहा है। समाज में सुख-शांति, समृद्धि , एकता, सहिष्णुता, सद्भाव पूर्वक संवाद के द्वारा सनातन परंपरा प्राप्त शासन तंत्र की स्थापना हो ।यह यज्ञ महामारी संकट का निवारण सकल रोग आधी व्याधी भय पीड़ा का निवारण हो तथा समाज सुबुद्ध तथा सामंजस्य पूर्ण संवाद स्थापित हो। व्यास पीठ तथा सासन तंत्र मे स्वालंबी बनाकर सेवा तथा परोपकार के कार्य में आगे बढ़ सके। संध्या बेला मे महाआरती की गई।

Related Articles

Back to top button