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कौन थे एडविन लुटियंस, PM मोदी की घोषणा के बाद राष्ट्रपति भवन से हटाई गई जिनकी प्रतिमा

नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन से प्रसिद्ध ब्रिटिश आर्किटेक एडविन लुटियंस की प्रतिमा हटा दी गई है। उनकी जगह स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर-जनरल सी. राजगोपालाचारी की प्रतिमा स्थापित की गई है। प्रधानमंत्री मोदी ने ‘मन की बात’ में कहा था कि देश गुलामी के प्रतीकों को पीछे छोड़ रहा है।

राष्ट्रपति भवन के केंद्रीय प्रांगण में दशकों से स्थापित एडविन लुटियंस की कांस्य प्रतिमा को स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर-जनरल सी. राजगोपालाचारी की प्रतिमा से बदल दिया गया है। इस बदलाव का कारण पीएम मोदी के मासिक रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ के 131वें एपिसोड में की गई घोषणा बनी। मोदी ने अपने श्रोताओं से कहा कि आज देश गुलामी के प्रतीकों को पीछे छोड़ रहा है और भारतीय संस्कृति से जुड़े प्रतीकों को महत्व देना शुरू कर रहा है।

13 बच्चों के परिवार में दसवें नंबर पर थे लुटियंस

एडविन लुटियंस के प्रारंभिक जीवन का विवरण उनकी बेटी से प्राप्त हुआ है। लुटियंस ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित अपने लेख में मैरी लुटियंस ने कहा है कि उनके पिता लंदन के ओन्सलो स्क्वायर और सरे के थर्सले में रहने वाले चार्ल्स और मैरी लुटियंस के 13 बच्चों के परिवार में दसवें बच्चे और नौवें लड़के थे।

कला जगत से जुड़ा था परिवार

उनका जन्म 29 मार्च 1869 को हुआ था और उनका नाम उनके पिता के मित्र, चित्रकार-मूर्तिकार सर एडविन लैंडसियर के नाम पर एडविन रखा गया था। एडविन लुटियंस को भी आगे चलकर नाइट की उपाधि मिली और वे सर बन गए। उनका परिवार कला जगत से जुड़ा हुआ था। उनके पिता कैप्टन चार्ल्स ऑगस्टस हेनरी लुटियंस एक सैनिक और चित्रकार थे। उनकी माता मैरी थेरेसा गैलवे आयरलैंड की थीं और गृहिणी थीं।

बीमारी के कारण स्कूल नहीं जा सके

उनकी बेटी के अनुसार, एडविन का उपनाम नेड था। बचपन में गठिया बुखार के कारण वह इतने कमजोर थे कि वे स्कूल नहीं जा सके। उनकी शिक्षा एक लेडी टीचर के पाठों और बड़े भाई से मिली कुछ शिक्षा का मिलाजुला रूप थी। उनकी बेटी कहती हैं कि उनकी शिक्षा सरे के ग्रामीण इलाकों में इमारतों को बनते हुए देखने में बिताए लंबे एकांत घंटों में हुई। उनकी बेटी लिखती हैं कि एडविन लुटियंस ने ऑस्बर्ट सिटवेल से कहा कि मेरे अंदर जो भी प्रतिभा है, वह बचपन में हुई एक लंबी बीमारी के कारण है। इस बीमारी ने मुझे सोचने का समय दिया। खराब स्वास्थ्य के कारण मुझे खेल खेलने की अनुमति नहीं थी। इसलिए मुझे अपने मनोरंजन के लिए अपने पैरों की बजाय आंखों का उपयोग करना सीखना पड़ा।

19 साल की आयु में व्यवसाय शुरू किया

उन्होंने शुरू में कुछ वास्तुकारों के कार्यालय में प्रशिक्षु के रूप में काम किया। 1888 में 19 वर्ष की आयु में अपना खुद का व्यवसाय शुरू किया। उनकी तुलना सर क्रिस्टोफर व्रेन से की जाने लगी जो प्रसिद्ध वास्तुकार थे। व्रेन ने 1666 की भीषण आग के बाद लंदन के कुछ हिस्सों, जिनमें सेंट पॉल कैथेड्रल भी शामिल है, का पुनर्निर्माण किया था।

बीसवीं सदी के सबसे महान ब्रिटिश वास्तुकार

एडविन लुटियंस ने बाग-बगीचे की डिजाइनर और भूदृश्यकार गर्ट्रूड जेकिल के साथ मिलकर अंग्रेजी ग्रामीण घरों को डिजाइन करके प्रतिष्ठा हासिल की। कई साथियों और वास्तुकला समीक्षकों ने एडविन लुटियंस को बीसवीं सदी का सबसे महान ब्रिटिश वास्तुकार बताया। लुटियंस के लिए नई दिल्ली परियोजना बिल्कुल अलग पैमाने की थी। 1911 में दिल्ली दरबार में किंग जॉर्ज पंचम द्वारा ब्रिटिश भारत की शाही राजधानी कलकत्ता से दिल्ली ट्रांसफर करने की घोषणा के बाद लुटियंस को नए शहर का मुख्य वास्तुकार नियुक्त किया गया।

दोस्त के साथ मिलकर भारत-यूरोपीय शैली विकसित की

अपने साथी ब्रिटिश वास्तुकार सर हर्बर्ट बेकर के साथ मिलकर उन्होंने एक मिश्रित भारत-यूरोपीय शैली विकसित की। इसमें पश्चिमी नवशास्त्रीय शैली को मुगल, बौद्ध और हिंदू रूपांकनों के साथ मिलाया गया। इस भव्य परियोजना के परिणामस्वरूप वायसराय भवन (अब राष्ट्रपति भवन), इंडिया गेट, नॉर्थ और साउथ ब्लॉक, गोलाकार कनॉट प्लेस और किंग्सवे का निर्माण हुआ।

जब दोस्त पर क्रोधित हो गए लुटियंस

लुटियंस की परिकल्पना थी कि सत्ता के केंद्र रायसीना हिल की ओर बढ़ते समय वायसराय हाउस का गुंबद औपचारिक अक्ष पर लगातार दिखाई देता रहे। जब बेकर द्वारा बनाई गई ढलान वाली सड़क ने इस दृश्य को ओझल कर दिया तो लुटियंस बेहद क्रोधित हुए। मैरी लुटियंस ने लिखा कि इसके बाद उनकी मित्रता कभी पूरी तरह से बहाल नहीं हो पाई। लुटियंस को 1918 में नाइट की उपाधि से सम्मानित किया गया। उनका निधन 1 जनवरी 1944 को हुआ। उनकी अस्थियां सेंट पॉल कैथेड्रल के तहखाने में रखी हैं।

26 वर्ग किलोमीटर में फैली है लुटियंस की दिल्ली

लुटियंस की दिल्ली लगभग 26 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र है। इसमें कम ऊंचाई और कम घनत्व वाले बंगले, वृक्षों से घिरी सड़कें और धार्मिक भवन हैं, जिन्हें लुटियंस और उनके सहयोगियों ने 1920 और 1940 के दशक के बीच डिजाइन किया था। विकास के बढ़ते दबाव के कारण इस क्षेत्र को 2002 में विश्व स्मारक कोष की 100 सबसे संकटग्रस्त स्थलों की सूची में शामिल किया गया था।

राजनीतिक प्रतीक बन गई थी लुटियंस की दिल्ली

दशकों से लुटियंस की दिल्ली एक खास तरह के लोगों के लिए राजनीतिक प्रतीक बन गई थी। अंग्रेजी बोलने वाले, कांग्रेस समर्थक और कथित तौर पर आम भारतीय जीवन से कटे हुए लोग। जब कांग्रेस विरोधी भाजपा सत्ता में आई तो प्रधानमंत्री मोदी और उनके समर्थकों ने इसे उन सभी चीजों के लिए इस्तेमाल किया जिनके वे खिलाफ थे। प्रधानमंत्री के रूप में मोदी इसी क्षेत्र में रहते हैं, लेकिन उन्होंने इसे नया रूप देने की कोशिश की है। लुटियंस की प्रतिमा हटाने का मुद्दा भी यहीं से जुड़ा है।

राजगोपालाचारी की प्रतिमा स्थापित

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सोमवार को नवघोषित ‘राजाजी उत्सव’ के उपलक्ष्य में राजगोपालाचारी की एक नई प्रतिमा का अनावरण किया। इस उत्सव के साथ 1 मार्च तक एक प्रदर्शनी भी आयोजित की जा रही है। राष्ट्रपति सचिवालय ने कहा कि यह पहल औपनिवेशिक मानसिकता के अवशेषों को मिटाने की दिशा में उठाए जा रहे कदमों की श्रृंखला का हिस्सा है। लुटियंस ने स्वयं उस इमारत का डिजाइन तैयार किया था, जिससे अब उनकी प्रतिमा हटाई जा रही है।

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