ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट में ख़ुद दलील देने का फ़ैसला क्यों किया, क्या हैं इसके संदेश?

पश्चिम बंगाल में इस साल विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के मुद्दे को लेकर राजधानी दिल्ली में मोर्चा खोल दिया है.
सुप्रीम कोर्ट में ख़ुद मौजूद रहने से लेकर चुनाव आयोग के साथ बैठक तक मुख्यमंत्री ने इन तीन दिनों में ज़ोरदार तरीक़े से केंद्र सरकार को घेरा.
ममता बनर्जी की छवि संसद से लेकर सड़क तक संघर्ष करने वाली नेता की रही है. लेकिन बुधवार को वह सुप्रीम कोर्ट में जजों के दलील देती भी दिखीं.
दिल्ली में एसआईआर का मुद्दा जिस तरह से अदालत से लेकर चुनाव आयोग तक उछाला, उसे एक संदेश के रूप में देखा जा रहा है कि ममता लड़ाई किसी भी स्तर पर लड़ सकती हैं.
ममता की यह राजनीतिक शैली रही है कि राजनीतिक टकराव मोर्चा ख़ुद संभालती हैं. चाहे यह लड़ाई संस्थान से हो या किसी पार्टी से
सुप्रीम कोर्ट में ख़ुद की बहस
ममता बनर्जी के दिल्ली दौरे के दौरान सबसे ज़्यादा चर्चा उनकी सुप्रीम कोर्ट में मौजूदगी को लेकर हुई. पश्चिम बंगाल में एसआईआर से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान वह अदालत में घंटों मौजूद रहीं.
अपनी दलीलों में ममता बनर्जी ने कहा कि 2025 की मतदाता सूची को ही आधार बनाया जाना चाहिए और 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले किसी नए प्रयोग से बचना चाहिए.
उन्होंने यह भी कहा कि मामूली ग़लतियों के आधार पर लोगों के नाम वोटर लिस्ट से नहीं हटाए जा सकते हैं.
ममता ने कहा कि जिन एक करोड़ 20 लाख वोटर्स के नामों में गड़बड़ी का संदेह जताया गया है, उनकी लिस्ट को सार्वजनिक किया जाना चाहिए.
तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि मुख्यमंत्री की मौजूदगी का उद्देश्य अदालत का ध्यान इस बात की ओर आकर्षित करना था कि एसआईआर की प्रक्रिया के कारण राज्य में बड़ी संख्या में लोगों को परेशानी का सामना कर रहे हैं.
पार्टी नेताओं का आरोप है कि कई मतदाताओं को बार-बार दस्तावेज़ जमा करने के लिए बुलाया जा रहा है. इससे वैध मतदाताओं के नाम सूची से हटने का डर पैदा हो रहा है.
ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग के साथ बैठक की.
इस बैठक में मतदाता सूची से जुड़े मामलों और एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर तीखी चर्चा हुई.
पार्टी नेताओं का कहना है कि मुख्यमंत्री ने आयोग के सामने यह मुद्दा उठाया कि कई लोगों को नोटिस मिलने के बाद सुनवाई में शामिल होना आम मतदाताओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है.
‘प्रतीची इंस्टीट्यूट’ के रिसर्चर सबीर अहमद इस क़दम को चुनाव से पहले रणनीतिक संदेश के रूप में देखते हैं.
वह कहते हैं, “यह एक अहम क़दम है क्योंकि चुनाव से पहले सुप्रीम कोर्ट में उनकी मौजूदगी यह संदेश देती है कि वह अपने नागरिकों के लिए मोर्चे पर खड़ी हैं. उनके पास क़ानूनी तौर पर बहस करने का अधिकार नहीं था. लेकिन प्रतीकात्मक तौर पर यह एक मज़बूत संदेश है. इससे बंगाल के नागरिकों की परेशानियाँ सामने आई हैं. चुनाव में केवल दो महीने बचे हैं, इसलिए यह सोचा-समझा और रणनीतिक क़दम है.”
दिल्ली दौरे के दौरान ममता बनर्जी की सार्वजनिक उपस्थिति और उनके साथ दिखाई देने वाले प्रतीक भी राजनीतिक चर्चा का विषय बने.
उन्होंने अपनी पारंपरिक सफ़ेद साड़ी के ऊपर काला रंग पहनकर विरोध का संकेत दिया. इसके साथ ही तृणमूल कांग्रेस क़रीब 50 एसआईआर से प्रभावित लोगों को भी साथ लेकर आई, यह भी एक अहम चर्चा का विषय बना.
पश्चिम बंगाल के भीतर ही नहीं, ममता बनर्जी ने दिल्ली में भी एसआईआर से प्रभावित परिवारों से मुलाक़ात की.
सबीर अहमद कहते हैं, “इसमें एक नाटकीय तत्व भी है, जिस तरह का पहनावा इस्तेमाल किया गया और बंग भवन में जो गतिविधियाँ हुईं. लेकिन एसआईआर से प्रभावित लोग इन प्रतीकों से ख़ुद को जुड़ा हुआ महसूस कर रहे हैं.”
वह कहते हैं, “उन्हें ‘बेगम ममता’ कहा जाता रहा है और वह कई बार प्रतिस्पर्धी सांप्रदायिक राजनीति के दबाव में दिखती हैं. इसलिए वह हिन्दू प्रतीकों का भी इस्तेमाल करती हैं.”
राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं कि एसआईआर से प्रभावित हिन्दू महिलाओं को उन्होंने साथ रखा ताकि कोई यह आरोप न लगा सके कि वह केवल अल्पसंख्यकों की वकालत करती हैं. वह मतदाताओं को यह दिखाना चाहती थीं कि इन मुद्दों को उठाने वाली अकेली नेता हैं.”


