आचार संहिता के दौरान शराब दुकानों में घालमेल

बिना बिल के ज्यादा कीमत में चलती रही बिक्री
जांच से हो सकता है करोड़ों का भ्रष्ट्राचार उजागर

भिलाई । विधानसभा चुनाव को लेकर लगी आचार संहिता के दौरान सरकारी शराब दुकानों में बड़ा घालमेल होने का दावा किया जा रहा है। बिना बिल के ज्यादा कीमत में शराब बेचने से मिली अतिरिक्त राशि आखिर कौन से खजाने में जमा कराई गई है, यह सवाल खड़ा हो गया है। शराब दुकानों में कीमत को लेकर बरती गई मनमानी में करोड़ों का खेल होने की संभावना से इंकार नहीं किया रहा है। नई सरकार द्वारा इस मामले की जांच कराये जाने पर असलियत उजागर हो सकती है।
भिलाई दुर्ग के सभी शराब की दुकानों में आचार संहिता के दौरान जमकर मनमानी हुई है। इस दौरान देशी और विदेशी शराब की कीमतें अचानक बढ़ा दी गई। पौव्वा के पीछे अधिकतम 20 रूपए अतिरिक्त लिया गया। वहीं बोतल लेने पर 50 से 60 रूपए वास्तविक कीमत से ज्यादा वसूली गई। खासबात यह भी रही कि आचार संहिता लगते ही प्राय: सभी दुकानों से प्रचलित ब्रांड की शराब रहस्मय तरीके से गायब हो गए। जो शराब की ब्रांड उपलब्ध थी उसके वास्तविक कीमत की जानकारी मदिरा प्रेमियों को नहीं होने का फायदा उठाते हुए अनाप-शनाप राशि वसूली जाती रही। बावजूद इसके आबकारी विभाग के जिम्मेदार लिखित में शिकायत होने पर कार्यवाही की बात कहकर पल्ला झाड़ते रहे।
सवाल यह उठ रहा है कि आचार संहिता के दौरान शराब दुकानों में जो कीमत बढ़ाकर राशि ली गई है, उसे आबकारी विभाग ने किस खजाने में जमा किया। शराब खरीदने वालों को मांगने के बाद भी बिल नहीं दिया गया। लिहाजा कीमत बढ़ जाने का हवाला देकर वसूली गई राशि के बंदरबांट होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा रहा है। ऐसे में अब जब नई सरकार बनने जा रही है, तो यह पूरा मामला जांच का विषय बनता है। गहराई और इमानदारी से जांच होने पर आबकारी विभाग के कई अधिकारियों की संलिप्तता उजागर होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा रहा है।
दरअसल चुनाव को लेकर लगभग दो माह तक आचार संहिता लगी रही। जैसे ही आचार संहिता लगा शराब की सभी सरकारी दुकानों में पौव्वा के पीछे 20 रूपए तथा बोतल पर 50 से 60 रूपए की अतिरिक्त वसूली शुरू हो गई। भिलाई-दुर्ग में इसकी शिकायत के बाद आबकारी विभाग के द्वारा ग्राहकों को बिल देने अनिवार्य किया गया। लेकिन एक दो दिन बाद पुन: बिल देने के प्रति सेल्समेन आनाकानी करने लगे। इतना ही नहीं ज्यादा कीमत वसूली के लिए कई सेल्समेनों ने आबकारी विभाग के अधिकारियों के मौखिक निर्देश का हवाला भी दिया। वैसे भी बिना अधिकारियों के इशारे और संरक्षण के कोई भी सेल्समेन ज्यादा कीमत वसूलकर शराब बेचने का साहस शायद ही दिखा पाता। इस तरह की मनमानी लगभग दो महीने तक चली है। ऐसे में करोड़ो के भ्रष्ट्राचार होने की आशंका साफ नजर आ रही है।
किसके खजाने में गया राशि
सरकारी शराब दुकानों से होने वाली आय और व्यय का हिसाब जिला आबकारी विभाग के अफसर रखते हैं। शराब विक्रय से मिली राशि को नियमानुसार सरकारी खजाने में जमा कराया जाता है। इसमें जो वास्तविक शराब की कीमत है, उसी के अनुरूप राशि जमा कराई जा सकती है। लेकिन आचार संहिता के दौरान हर उपलब्ध ब्रांड की शराब को उसके वास्तविक कीमत से अधिक राशि लेकर बेचे जाने की शिकायतें लगातार उड़ती रही। ऐसे में वास्तविक और मनमानी कीमत वृद्धि की जो अंतर राशि है, उसे किसके खजाने में जमा कराई गई, इस पर सवाल खड़ा किया जा रहा है।



