छत्तीसगढ़

तुम स्वयं आधार हो

. तुम स्वयं आधार हो

किसी ने कहा –
तुम ओस की बूँद हो,
क्षण भर में बिखर जाओगी।
पर किसी ने यह नहीं देखा
कि तुम्हारी नमी में
एक पूरा वन अंकुराने को जागता है।

तुम्हें समझाया गया –
चाँद बनो, शीतल रहो,
किसी आकाश के सहारे चमको।
पर तुमने कब जाना कि तुम्हारी देह में ही
एक अनदेखा सूर्योदय धड़कता है।

हाँ, तुम्हारी आँखों में
अब भी एक निष्कलुष झील सोती है,
जिसमें आकाश उतर आता है।
पर सावधान –
दुनिया के कई प्यासे पथिक
जल नहीं, प्रतिबिंब चुराने आते हैं।

मासूम रहना अपराध नहीं,
फूल होना भी दुर्बलता नहीं।
बस याद रखना-
हर गुलाब के भीतर
एक मौन काँटा भी जन्म लेता है।

जब भी लगे कि राहें किसी और के कदमों की मोहताज हैं,
तब अपने भीतर उतरना।

वहीं किसी गहरी मिट्टी में एक बीज फुसफुसाएगा

“तुम आश्रय नहीं खोजती,
तुम स्वयं आश्रय बन सकती हो।”
तुम राह नहीं पूछती,
तुम्हारे कदमों से ही
नई दिशाएँ जन्म लेती हैं।” ऋचा चंद्राकर 'तत्वाकांक्षी'

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