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प्राणवल्लभ

. प्राणवल्लभ

मेरे हृदय के आँगन में, सिया संग राम विराजित हैं।
प्राण-प्रवाह में वही बसे, वे ही जीवन-के साजित हैं।।
मिट गई अब सब ममता–मद, जग की ज्वाला शांत हुई।
अब केवल हरि का ध्यान रहा, मन मुरली प्रियकांत हुई।।

दीप जले जब नाम रमा, मन मंदिर आलोकित हो।
दुःख-संकट सब दूर हुए, जब ध्यान रघुवर आमोदित हो।।
पास रहें जब राम मेरे, तब जीवन आनंद बने।
दूर रहें जब नाथ यदि तो, श्वास-श्वास भी मंद बने।।

श्याम-वृंदा सौंदर्य समन्वित, प्रेम सुधा बरसाती है।
नयनन में रचि एक रूप, जगत सुधि हर जाती है।।
नयन निरंतर देख न पाएँ, तो चित व्याकुल हो जाता है।
राम मिलन की आश जलधि में, हर भाव मोती बन जाता है।। ऋचा चंद्राकर "तत्वाकांक्षी"

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