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मैं ऋचा हूँ

. मैं ऋचा हूँ

कुछ ऋचाएं वेद तल की चाह में डूबी हुई है,
उन ऋचाओ के सुपावन शब्द वर्णन कर रही हूँ।

मैं ऋचा हूँ वेद तल की चाह उर में धर रही हूँ….!

कंठ से जिन भी ऋचाओं को नहीं गाया गया है,
नयन कोरे पृष्ठ से जो वाक्य हटवाया गया है।
शब्द रचना साकलो से व्यक्ति हित दूरी बनी है,
भाव बहकर रुक गए अब सागरो से फिर ठनी है।।

कुछ व्यथाएँ खेद मन की चाह में टूटी हुई है,
उन व्यथाओं के रूवासे शब्द वर्णन कर रही हूँ।

मैं ऋचा हूँ रेह मन की प्यास उर में धर रही हूँ…!

हा अभागे नींन्द जागे जाग भागे क्रूर रागें,
दीप आंखे कीट पाँखें स्वप्न झांके क्रूर मांगे।
आह क्रन्दित बाह वंदित देह मन्दित मन खंडित,
पीर स्वन्दित शब्द पृष्ठित गीत विरचित नेह मंडित।

कुछ शिराएं हृदय भर की चाह में डूबी हुई है,
उन शिराओं की सुपावन राह वर्णन कर रही हूँ।

मैं ऋचा हूँ नेह मन की राह उर में धर रही हूँ।

भाव की यह व्यूह रचना शब्द फसते नित्य जाते,
लोरियों में डूबते सूरज कहां मन शांति पाते।
मध्य रण को छोड़ना यह नीति अनुगामी नही है,
स्वप्न टूटे है अलग पर स्वप्न आयामी नहीं है।

भावनाएं ताप नद की धार में डूबी हुई है,
भावनाओं की सुपावन थाह वर्णन कर रही हूँ।

मैं ऋचा हूँ नेह नद की बाह उर में धर रही हूँ…! ऋचा चंद्राकर "तत्वाकांक्षी"

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