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सावधान! थाली में परोसा जा रहा ‘धीमा जहर’ : पशु उत्पादों से इंसानों में फैल रहा एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस

रायपुर। अगर आप नॉनवेज या डेयरी उत्पादों के शौकीन हैं तो सावधान हो जाइए। आपकी पसंदीदा चिकन करी या पनीर की सब्जी आपके शरीर में ‘एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस’ (दवा प्रतिरोधक क्षमता) का बीज बो रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, राज्य में अब आंत्रशोथ, उल्टी और दस्त जैसी सामान्य बीमारियों का इलाज भी जटिल होता जा रहा है

इसका मुख्य कारण खराब भोजन नहीं, बल्कि पशुपालन और पोल्ट्री फार्मों में स्वस्थ पशुओं को भी एंटीबायोटिक्स का अंधाधुंध इस्तेमाल है, जो भोजन के जरिए इंसानों तक पहुंच रहा है।

आंकड़े बताते हैं कि देश-प्रदेश में 30 प्रतिशत से अधिक बैक्टीरियल संक्रमण अब सामान्य दवाओं से ठीक नहीं हो रहे हैं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए छत्तीसगढ़ सरकार अब उन पशुपालकों और दवा विक्रेताओं पर शिकंजा कसने की तैयारी में है, जो बिना नियम-कायदे के एंटीबायोटिक्स का वितरण कर रहे हैं। स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने स्पष्ट किया है कि केंद्र सरकार के निर्देशों के अनुरूप राज्य में जल्द ही एक प्रभावी कार्ययोजना लागू की जाएगी।

75 प्रतिशत हिस्सा पशुपालन और पोल्ट्री उद्योग में

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) रायपुर के अध्यक्ष डा. कुलदीप सोलंकी ने चौंकाने वाले तथ्य साझा किए हैं। उनके अनुसार दुनियाभर में उत्पादित कुल एंटीबायोटिक्स का 75 प्रतिशत हिस्सा पशुपालन और पोल्ट्री उद्योग में खपाया जा रहा है। इंसानी इलाज के लिए मात्र 25 प्रतिशत दवाओं का उपयोग होता है। बीमार ही नहीं, बल्कि स्वस्थ पशुओं को भी वजन बढ़ाने और संक्रमण से बचाने के लिए दवाओं का मनमाना डोज दिया जा रहा है।

कोलिस्टिन भी हो रही फेल

डा. सोलंकी ने चेतावनी दी है कि चीन जैसे देशों में ‘कोलिस्टिन’ जैसी जीवनरक्षक दवाओं के प्रति भी रेजिस्टेंस देखा गया है। कोलिस्टिन वह अंतिम हथियार है, जिसे डॉक्टर तब इस्तेमाल करते हैं, जब अन्य सभी एंटीबायोटिक्स फेल हो जाते हैं। पशुओं के जरिए यह रेजिस्टेंस म्यूटेशन और जेनेटिक ट्रांसफर के माध्यम से इंसानों तक पहुंच रहा है। हालिया मामलों में कंपाइलोबैक्टर, ई-कोलाई और शिगेला जैसे खतरनाक बैक्टीरिया पाए गए हैं। ई-कोलाई अब न केवल पेशाब में संक्रमण कर रहा है, बल्कि किडनी को भी सीधे प्रभावित कर रहा है।

सरकार को उठाने होंगे ये कदम

केवल एमबीबीएस या उच्च डिग्री वाले डॉक्टरों को ही एंटीबायोटिक दवाएं लिखने का अधिकार हो।

स्वस्थ पशुओं पर दवाओं के प्रयोग को रोकने के लिए एक विशेष आयोग का गठन किया जाए।

बिना प्रिस्क्रिप्शन (पर्चे) के एंटीबायोटिक बेचने वाले दुकानदारों पर एफआईआर दर्ज करने का प्रावधान हो।

पशुओं को एंटीबायोटिक केवल प्रमाणित वेटरनरी डॉक्टरों की सलाह पर ही दी जाए।

मरीजों के लिए जरूरी सावधानी

बिना डॉक्टर की सलाह के कभी भी एंटीबायोटिक न लें।

दवा का कोर्स हमेशा पूरा करें, बीच में न छोड़ें (अंडरडोजिंग से रेजिस्टेंस बढ़ता है)।

सामान्य सर्दी-जुकाम जैसे वायरल संक्रमण में एंटीबायोटिक लेने की जिद न करें।

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