धर्म

कब है महाशिवरात्रि का महापर्व? जानें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

महाशिवरात्रि का पावन पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन का प्रतीक है। इस वर्ष महाशिवरात्रि की सही तिथि   को लेकर कई लोगों में असमंजस है, लेकिन पंचांग के अनुसार फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि 15 फरवरी को शाम 5:04 बजे से शुरू होकर 16 फरवरी को शाम 5:34 बजे तक रहेगी। चूंकि महाशिवरात्रि की पूजा में मध्यरात्रि के समय का विशेष महत्व होता है, इसलिए   यह महापर्व 15 फरवरी को मनाना ही शास्त्रसम्मत और उचित है। इसी रात शिव आराधना का मुख्य समय रहेगा, जिसमें भक्त श्रद्धापूर्वक व्रत और पूजन करेंगे।

श्रद्धालु इन अलग-अलग प्रहरों   में अपनी श्रद्धा के अनुसार भगवान शिव का अभिषेक और मंत्र जाप करते हैं। मान्यता है कि इस रात   की गई साधना और ध्यान कई गुना अधिक फल प्रदान करती है।शिव पूजा और व्रत में भूलकर भी न करें ये गलतियां, जानें जरूरी नियम

महाशिवरात्रि पर भगवान शिव की चार प्रहर की पूजा का   विशेष विधान है, जो शाम से शुरू होकर अगले दिन सुबह तक चलती है। प्रथम प्रहर की पूजा शाम 6:00 से रात 9:00 बजे तक, द्वितीय प्रहर रात 9:00 से 12:00 बजे तक, तृतीय प्रहर   आधी रात से सुबह 3:00 बजे तक और चतुर्थ प्रहर सुबह 3:00 से 6:00 बजे तक होता है।

शिव पूजा और व्रत में भूलकर भी न करें ये गलतियां, जानें जरूरी नियम ; महाशिवरात्रि का पावन पर्व आत्म-संयम और भक्ति का प्रतीक है, जिसे देशभर में बड़ी   श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। मान्यता है कि सही नियमों और सादगी के साथ की गई शिव आराधना न केवल आत्मिक शांति देती है, बल्कि जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी करती है। हालांकि, कई बार अनजाने में भक्त कुछ ऐसी गलतियां कर देते हैं जिससे पूजा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं हो पाता। शिव पूजा में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शिवलिंग पर कभी भी केतकी के   फूल, तुलसी दल या सिंदूर/कुमकुम अर्पित नहीं करना चाहिए, क्योंकि शास्त्रों में इन्हें वर्जित माना गया है। साथ ही, शिव जी का अभिषेक करते समय शंख का उपयोग करने से भी बचना चाहिए।

व्रत के दौरान खान-पान के नियमों का पालन करना भी उतना ही आवश्यक है। महाशिवरात्रि के दिन अनाज,   जैसे गेहूं, चावल, बेसन और मैदा का सेवन पूरी तरह वर्जित है। इसके अलावा, भोजन में प्याज और लहसुन जैसे तामसिक पदार्थों का उपयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये ध्यान और साधना में बाधा डालते हैं। व्रत में सादा नमक की जगह सेंधा नमक का इस्तेमाल करें और शरीर में भारीपन से बचने   के लिए बहुत अधिक तला-भुना भोजन करने से बचें। नशीले पदार्थों और मांस-मदिरा से पूर्णतः दूरी बनाए रखना इस व्रत की पवित्रता के लिए अनिवार्य है।

शिवलिंग की परिक्रमा और पात्रों के चुनाव में भी विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। शिवलिंग का जलाभिषेक करने के लिए तांबे   का लोटा शुभ माना जाता है, लेकिन यदि आप दूध से अभिषेक कर रहे हैं, तो स्टील या चांदी के बर्तन का ही प्रयोग करें, क्योंकि तांबे के पात्र में दूध विषतुल्य हो जाता है। एक और महत्वपूर्ण नियम यह है कि शिवलिंग की कभी भी पूरी परिक्रमा नहीं करनी चाहिए; हमेशा आधी परिक्रमा करें और जलाधारी (जहाँ से जल   बहता है) को कभी न लांघें। इन सरल लेकिन जरूरी नियमों का पालन करते हुए की गई पूजा से भगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद और आध्यात्मिक संतोष प्राप्त होता है।

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