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बैंक द्वारा लोन को NPA घोषित करना ही सीमा अवधि तय नहीं करता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी बैंक द्वारा लेखांकन या प्रावधान संबंधी उद्देश्यों से लोन को आंतरिक रूप से NPA (गैर-निष्पादित परिसंपत्ति) के रूप में वर्गीकृत कर देना, अपने आप में दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता के तहत सीमा अवधि की शुरुआत निर्धारित नहीं करता विशेषकर तब जब बाद में लोन का पुनर्गठन किया गया हो और नए समझौतों के माध्यम से देयता को स्वीकार किया गया हो।

अदालत ने कहा कि बैंक अपने लेखा-जोखा में किसी लोन को किस प्रकार दर्शाता है यह सीमा अवधि की गणना के लिए निर्णायक नहीं है। यदि पुनर्गठन के दौरान नए कार्यशील पूंजी संघ समझौते निष्पादित किए गए हों और उनमें बकाया देनदारियों को स्वीकार किया गया हो तो ऐसे समझौते लोन को एक प्रकार से नई जीवन अवधि प्रदान करते हैं। ऐसी स्थिति में पुनर्गठन के बाद की NPA तिथियां सीमा अवधि निर्धारण के लिए प्रासंगिक होंगी।

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने मेटल क्लोजर प्राइवेट लिमिटेड के निलंबित प्रबंध निदेशक द्वारा दायर अपील खारिज करते हुए भारतीय स्टेट बैंक के नेतृत्व वाले बैंकों के संघ द्वारा शुरू की गई दिवाला कार्यवाही को वैध ठहराया।

मामले में भारतीय स्टेट बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, कॉरपोरेशन बैंक और यूको बैंक ने संयुक्त रूप से धारा 7 के तहत आवेदन दायर कर 280 करोड़ रुपये से अधिक की चूक का आरोप लगाया। राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण, बेंगलुरु ने 14 दिसंबर 2018 को इस आवेदन को स्वीकार कर लिया।

निलंबित प्रबंध निदेशक ने यह कहते हुए आदेश को चुनौती दी कि खाता जनवरी 2010 में NPA घोषित किया गया, जबकि दिवाला आवेदन अप्रैल 2018 में दायर किया गया, जो तीन वर्ष की सीमा अवधि से परे है।

विभिन्न चरणों की सुनवाई और संशोधित आवेदन के बाद राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण ने माना कि बाद के ऋण स्वीकारों के मद्देनजर आवेदन सीमा अवधि के भीतर है।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि धारा 7 का आवेदन दोषपूर्ण था, क्योंकि उसमें वास्तविक चूक की तिथि के बजाय केवल NPA की तिथि का उल्लेख था। यह भी कहा गया कि जिन बैलेंस शीटों पर बैंक भरोसा कर रहे हैं, वे विधिवत अनुमोदित नहीं थीं इसलिए सीमा अवधि का विस्तार नहीं कर सकतीं।

बैंकों की ओर से कहा गया कि 2010 से 2014 के बीच खातों का पुनर्गठन हुआ नए संघ समझौते हुए जिनमें बकाया देनदारियों को स्वीकार किया गया। साथ ही वित्तीय वर्ष 2013-14 और 2014-15 की बैलेंस शीट, जो 30 सितंबर, 2015 को हस्ताक्षरित थीं परिसीमा अधिनियम की धारा 18 के तहत देयता की लिखित स्वीकारोक्ति हैं, जिससे नई सीमा अवधि प्रारंभ होती है।

अदालत ने आपत्ति खारिज करते हुए कहा कि संशोधित धारा 7 आवेदन में सभी आवश्यक तथ्यों का उल्लेख किया गया। पुनर्गठन के दौरान निष्पादित नए समझौते और बैलेंस शीट में की गई लिखित स्वीकारोक्ति ने देनदारी की प्रवर्तनीयता को पुनर्जीवित किया।

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि यदि किसी पक्ष द्वारा हस्ताक्षरित लिखित स्वीकारोक्ति प्रस्तुत हो तो परिसीमा अधिनियम की धारा 18 लागू होती है और नई सीमा अवधि प्रारंभ होती है। निदेशक कंपनी का अभिकर्ता होता है, इसलिए उसके द्वारा हस्ताक्षरित बैलेंस शीट वैध स्वीकारोक्ति मानी जाएगी।

चूंकि कंपनी स्वयं इन बैलेंस शीटों पर ऋण वसूली अधिकरण में भी निर्भर कर चुकी थी, इसलिए वे सीमा अवधि बढ़ाने के लिए पर्याप्त थीं।

अदालत ने यह भी कहा कि जब निर्णायक प्राधिकारी यह संतुष्ट हो जाए कि वित्तीय ऋण अस्तित्व में है और वैधानिक सीमा से अधिक चूक हुई है तो धारा 7 के आवेदन को स्वीकार करने से इनकार करने की गुंजाइश बहुत सीमित रह जाती है।

इन टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज की और मेटल क्लोजर प्राइवेट लिमिटेड के विरुद्ध दिवाला कार्यवाही को सीमा अवधि के भीतर मानते हुए बरकरार रखा।

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