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देश के सबसे बड़े सुरक्षा बल सरकार के खिलाफ कोर्ट क्यों पहुंचे?

इन बलों का इतिहास अंग्रेजों के दौर से जुड़ा है. 1939 में “क्राउन रिप्रेजेंटेटिव पुलिस” (CRP) बनाई गई थी, जिसे आजादी के बाद 1949 में सरदार वल्लभभाई पटेल ने नया नाम दिया CRPF (सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स). बाद में BSF (1965), ITBP (1962), SSB (1963) और CISF (1969) बनीं. इन सबको मिलाकर CAPF कहा जाता है.

शुरुआत में ऊंचे पदों पर आर्मी और फिर IPS अधिकारियों को डेपुटेशन पर लाया गया. धीरे-धीरे यह व्यवस्था स्थायी होती चली गई. आज हालात यह हैं कि DIG और IG जैसे बड़े पदों पर बड़ी संख्या में IPS अधिकारी तैनात होते हैं. CAPF अधिकारियों का आरोप है कि उनके अपने अफसरों को ऊपर जाने का मौका नहीं मिलता.

CAPF अधिकारियों की नाराजगी क्या है?

CAPF में अधिकारी UPSC के जरिए असिस्टेंट कमांडेंट बनते हैं. प्रमोशन यहां “वैकेंसी बेस्ड” है यानी पद खाली होगा तभी तरक्की मिलेगी. इसके उलट IAS-IPS में प्रमोशन समय के हिसाब से होता है.

अधिकारियों का कहना है:

  • प्रमोशन बहुत धीमा है.
  • कई लोग 10-15 साल तक एक ही रैंक पर अटके रहते हैं.
  • Non Functional Financial Upgradation (NFFU) जैसे लाभ नहीं मिलते.
  • सीनियर पद IPS के लिए रिजर्व जैसे हो गए हैं.

उनका तर्क है कि जो अधिकारी नीचे से जवानों के साथ काम करते हुए ऊपर आते हैं, वे फोर्स की असली समस्याओं को बेहतर समझते हैं. अगर उन्हें नेतृत्व का मौका मिले तो बल का मनोबल और प्रदर्शन दोनों बेहतर होंगे.

OGAS  क्या है ? 

OGAS (Organised Group ‘A’ Service) केंद्र सरकार की उन सर्विस को कहा जाता है जिनका अपना व्यवस्थित कैडर फ्रेमवर्क, हैरार्की और डिफाइन प्रोमोशन प्रोसेस होती है. इन सर्विस में अधिकारियों की भर्ती आमतौर पर UPSC के जरिए होती है और उन्हें समय के साथ प्रोमोशन, वेतनमान और Non Functional Financial Upgradation (NFFU) जैसे लाभ मिलते हैं. OGAS का दर्जा मिलने से किसी सेवा को दूसरी केंद्रीय सेवाओं के बराबर माना जाता है. इससे कैडर मैनेजमेंट, करियर प्रोग्रेशन, फाइनेंशियल लाभ और प्रशासनिक पहचान मजबूत होती है. यही दर्जा पाने की मांग CAPF अधिकारी लंबे समय से कर रहे हैं.

कोर्ट में क्या हुआ?

2012 में CAPF अधिकारियों ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. 2015 में हाईकोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला दिया और CAPF को “Organised Group A Service (OGAS)” मानने को कहा. सरकार सुप्रीम कोर्ट गई, लेकिन 2019 में वहां भी हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रहा. इसके बाद 2025 में सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने फिर स्पष्ट आदेश दिया कि CAPF को OGAS के सभी लाभ दिए जाएं और IG-DIG स्तर पर IPS डेपुटेशन को तय समय में खत्म किया जाए लेकिन इसके बावजूद सरकार ने कई IPS अधिकारियों की नई नियुक्तियां कर दीं. सरकार ने फैसले पर पुनर्विचार याचिका (Review Petition) भी दाखिल की गई जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है. 

सरकार का पक्ष क्या है?

सरकार का कहना है कि IPS अधिकारियों की मौजूदगी से केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर तालमेल रहता है और फोर्स “नेशनल सिक्योरिटी फ्रेमवर्क” से जुड़ी रहती है. मीडिया रेपोर्ट्स के अनुसार CAPF के पूर्व अधिकारियों का कहना है कि अगर ऐसा है तो फिर CAPF अधिकारियों को भी IPS कैडर में डेपुटेशन का मौका क्यों नहीं दिया जाता?

मनोबल और अट्रिशन की चिंता

CAPF में अट्रिशन रेट यानी नौकरी छोड़ने की दर काफी ज्यादा बताई जाती है. अधिकारियों और जवानों का कहना है:

  • 18-18 घंटे ड्यूटी.
  • परिवार से दूर रहना.
  • प्रमोशन में देरी.
  • सुविधाओं की कमी.

इन सबका असर मनोबल पर पड़ रहा है. कुछ अधिकारियों ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को पत्र लिखकर दखल की मांग की है.

अब आगे क्या?

यह सिर्फ प्रमोशन या पद का मामला नहीं है. यह देश की आंतरिक सुरक्षा संभालने वाले बलों के सम्मान, करियर और मनोबल से जुड़ा बड़ा मुद्दा है. अब नजर सरकार और सुप्रीम कोर्ट, दोनों पर है कि इस विवाद का हल कैसे निकलता है.

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