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9 दिन से शिविर नहीं गए, वैनिटी-वैन शंकराचार्य का घर:लग्जरी सुविधाओं से लैस, वॉशरूम से लेकर बेड तक

प्रयागराज माघ मेले में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के बीच विवाद जारी है। पिछले 9 दिनों से शंकराचार्य ने अपने शिविर में प्रवेश नहीं किया है। उनका कहना है कि जब तक प्रशासन उनसे माफी नहीं मांगता, ससम्मान मौनी अमावस्या वाला स्नान नहीं करवाता, तब तक वह शिविर के बाहर ही रहेंगे।शंकराचार्य अपनी बात पर अटल हैं। शिविर के अंदर नहीं गए हैं। उन्होंने अब अपनी गाड़ी को ही अपना घर बना लिया है। हालांकि इस गाड़ी में वह सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं, जो किसी व्यक्ति की जरूरत होती हैं।

फोर्स मोटर्स भारत की प्रमुख ऑटोमोटिव कंपनी है। यह पुणे में स्थित है। कंपनी मुख्य रूप से कामर्शियल गाड़ियां बनाती हैं। इनमें वैन, मिनी-बस और ट्रैवलर शामिल हैं। ये कंपनी मर्सिडीज-बेंज और बीएमडब्ल्यू जैसी गाड़ियों के लिए इंजन भी बनाती है।

अविमुक्तेश्वरानंद के पास 17 सीटर अर्बानिया 4400 डब्ल्यूबी गाड़ी है। इस गाड़ी की शोरूम कीमत करीब 30 लाख रुपए है। इसकी कीमत राज्य और शहर के हिसाब से थोड़ी अलग हो सकती है।

लेकिन, जब यही गाड़ी सड़क पर उतरती है तो इसकी कीमत 37 लाख रुपए तक हो जाती है। क्योंकि इसमें आरटीओ चार्ज के रूप में करीब 4 लाख, इंश्योरेंस के रूप में डेढ़ लाख और अन्य सुविधाओं के लिए करीब 30 हजार रुपए का खर्च आता है। यह डीजल गाड़ी है और एक लीटर में करीब 11 किलोमीटर चलती है।

मॉडिफाई में 40 से 50 लाख रुपए खर्च हुए शंकराचार्य की इस गाड़ी की सीटें बीएमडब्ल्यू जैसी गाड़ियों की तरह हैं। पीछे की नॉर्मल सीटों को हटाकर प्रीमियम सोफा लगाया गया है। इंटीरियर डिजाइन ऐसा किया गया है, जैसे किसी 5 फाइव स्टार होटल की छतों में होता है। शंकराचार्य जिस सीट पर बैठते हैं, उसके ठीक बगल वैसी ही एक सीट है, जिस पर वह अपने भगवान रखते हैं। जब कभी गौमुख यात्रा पर निकलते हैं तो लोग उनके साथ भगवान के भी दर्शन करते हैं।

प्रीमियम सोफा, शंकराचार्य की सीट और ऊपरी इंटीरियर तो नजर आता है, लेकिन उसके पीछे के हिस्से को इस वक्त पर्दा लगाकर ढक दिया गया है। किसी को भी अंदर जाने की अनुमति नहीं होती। अंदर क्या कुछ है, इसके बारे में कोई भी कैमरे पर बात नहीं करता।

गाड़ी के अंदर शॉवर और फ्रिज भी मौजूद अर्बानिया की जितनी भी गाड़ियां मॉडिफाई होकर वैनिटी वैन बनीं, उनमें टॉयलेट, सिंक, शावर, छोटा फ्रिज और माइक्रोवेव भी जोड़ा गया है। शंकराचार्य की इस गाड़ी में भी इस तरह की सुविधाएं हैं। गाड़ी में पानी भरने के लिए 4 तरह से सुविधाएं हैं। जिस वक्त ड्राइवर इसमें पानी भर रहे थे, हमारी टीम वहीं मौजूद थी। ड्राइवर कहते हैं कि शुरुआत में एक ही तरफ से यह सुविधा थी। लेकिन, बाद में इसमें यह सुविधा बढ़ाई गई। अब 4 तरफ से पानी भरा जा सकता हैइस गाड़ी में हाईटेक कैमरे भी लगाए गए हैं। जिस जगह शंकराचार्य बैठते हैं, वहां कंट्रोल रूम पैनल बनाया गया है। वहां से वह ड्राइवर से बात कर सकते हैं। साथ ही इसमें जो स्क्रीन लगी है, उसके जरिए वह ड्राइवर को देख सकते हैं। सामने और पीछे की भी स्थिति को लगातार देख सकते हैं। बेहतर एयर कंडीशनिंग की सुविधा है। इसके लिए लगातार गाड़ी को स्टार्ट नहीं रखा जाता, बल्कि अंदर ही एक इन्वर्टर भी होता है।

ऑटो मोबाइल इंडस्ट्री से जुड़े लोगों से बात करने पर समझ आता है कि इस वैनिटी वैन को मॉडिफाई करवाने में 40 से 50 लाख रुपए खर्च होते हैं। मतलब जो गाड़ी 35 लाख की होती है, वह मॉडिफाई करने के बाद 80 से 85 लाख रुपए की हो जाती है।

शंकराचार्य के शिविर में इसी तरह की एक और गाड़ी खड़ी है। हालांकि, उसे पर्दे के पीछे रखा गया है। वहां जाने की मनाही है। शंकराचार्य की इस गाड़ी का नंबर भी स्पेशल है। छत्तीसगढ़ की इस गाड़ी का नंबर 1008 है।मौनी अमावस्या पर स्नान नहीं करने देने से शुरू हुआ था विवाद शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के बीच इस विवाद की शुरुआत 18 जनवरी को मौनी अमावस्या के दिन से शुरू हुई थी। शंकराचार्य पुल नंबर-2 से संगम जाने के लिए निकले थे। उस दिन यह पुल बंद था। शंकराचार्य की पालकी लेकर चल रहे लोगों ने इस पुल को खोल दिया और आगे बढ़ने लगे थे। संगम के पास जाने लगे तो पुलिस ने उन्हें रोक लिया। पुलिस प्रशासन ने उनके साथ मौजूद शिष्यों, साधुओं को पकड़ा और हिरासत में लेकर चले गए। हिरासत में पुलिस ने उनके साथ मारपीट की।

करीब 3 घंटे तक शंकराचार्य पालकी पर वहीं बैठे रहे। इसके बाद सादी वर्दी में पुलिस के जवान आए और शंकराचार्य की पालकी को धक्का देते हुए संगम से करीब 500 मीटर दूर अक्षयवट मार्ग पर छोड़कर चले आए। वहां वह अकेले खड़े रहे।

इसके बाद प्रशासन के लोग उन्हें पुल पार कराते हुए शिविर के बाहर छोड़कर आ गए। शंकराचार्य को जहां छोड़ा गया था, वह वहीं बैठ गए। पिछले 9 दिनों से वह उसी जगह पर बैठे हैं। वहीं वैनिटी वैन खड़ी होती है। वह रात में उसमें रहते हैं। शिविर के अंदर प्रवेश नहीं करते।

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