Category: धर्म-अध्यात्म

शनिवार को है करवाचौथ , इस बार सुहागिनें नहीं कर पाएंगी व्रत का उद्यापन

सबका संदेस न्यूज छत्तीसगढ़ कवर्धा पंडित देवदत्त शर्मा- 27. 10. 2018 शनिवार को है करवाचौथ , इस बार सुहागिनें नहीं कर पाएंगी व्रत का उद्यापन

महिलाये पूरे साल बेसब्री से करती है इसका इन्तजार

सुहागिनों के लिए करवा चौथ व्रत का खाश महत्व है। सुहागिन महिलायें इस व्रत का पूरे साल बेसब्री से इन्तजार करती हैं । इस साल करवा चौथ आने वाले शनिवार 27.10.2018 को मनाया जाएगा, लेकिन सुहागिनें इस बार व्रत का उद्यापन नहीं कर पाएंगी। कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को करवा चौथ का व्रत किया जाता है। इसबार यह व्रत 27 अक्टूबर को मनाया जा रहा है। यह पर्व सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद खास माना जाता है। इस दिन महिलाएं बगैर कुछ खाये – पीये शाम को चंद्रदर्शन के साथ अपना व्रत तोड़ती हैं।
सुहागिनें अपने करवा चौथ के व्रत का उद्यापन इस साल नहीं कर पाएंगी। दरअसल इस बार करवा चौथ के दौरान शुक्र अस्त रहेगा। शुक्र अस्त के दौरान सभी शुभ कार्य वर्जित होते हैं। इस बार शुक्र अस्त 19 अक्टूबर को दिन में पश्चिम दिशा में हुआ है।शुक्र का उदय पूर्वोदय में 31. 10. 2018 को होगा । क्षेत्र की अनेक महिलायें नवरात्र के बाद से ही इसकी तैयारी में लगी हैं ।
महिलाएं सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान ध्यान करती है। पूरे दिन भूखी-प्यासी रहती हैं। दिन में इनके द्वारा शिव, पार्वती और कार्तिक की पूजा की जाती है। शाम को देवी की पूजा होती है, जिसमें पति की लंबी उम्र की कामना की जाती है। चंद्रमा दिखने पर महिलाएं पतली छिद्र वाली चलनी से पति और चंद्रमा की छवि देखती हैं। पति इसके बाद पत्नी को पानी पिलाकर व्रत तुड़वाता है।इस रोज बगैर खाए या पिए महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र की कामना में व्रत रहती हैं।

करवा चौथ की पूजा में कुछ विशेष मंत्रों का जाप करना अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है। इनमें शिव पार्वती आैर श्री गणेश की आराधना के मंत्र मुख्य है। इस बार करवाचौथ की पूजा का शुभ मुहूर्त सांयकाल 6 बजकर 37 मिनट पर भद्रा की निवृत्ती के बाद शुभ रहेगा, वहीं चंद्रोदय का समय रात्रि 07. 49 बजे का है । सुहागिनें रात्रि में 11 बजकर 02 मिनट तक चन्द्रमा और पति का पूजन कर सकतीं हैं । जिनके यहां उदित होते चंद्रमा की पूजा की जाती है वे स्त्रियां इसी समय चांद को अर्ध्य देंगी। जहां चंद्रमा के पूर्ण रूप से विकसित होने बाद पूजा की जाती है वो 15 से 20 मिनट बाद अर्ध्य दे सकती हैं।

करवा चौथ सौभाग्यवती महिलाआें का प्रमुख त्योहार माना जाता है। करवा चौथ का व्रत सुबह सूर्योदय से पूर्व प्रात: 4 बजे प्रारंभ होकर रात में चंद्रमा दर्शन के बाद पूर्ण होता है। किसी भी आयु, जाति, वर्ण, संप्रदाय की स्त्री को इस व्रत को करने का अधिकार है। जो सुहागिन स्त्रियां अपने पति की आयु, स्वास्थ्य व सौभाग्य की कामना करती हैं वे यह व्रत रखती हैं। 

शुभ मुहूर्त में करवा चौथ की पूजा प्रारंभ करें। इसके लिए करवों में लड्डू रखकर अर्पित करें। एक लोटा, एक वस्त्र व एक विशेष करवा बायना के रूप में रख कर ही पूजन करें। करवा चौथ व्रत की कथा अवश्य पढ़ें अथवा सुनें। रात्रि में चांद निकलने पर चंद्रमा का पूजन कर अर्घ्य प्रदान करें।

 

 

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शंकराभवनम शाँति दीप कालोनी कवर्धा ( छत्तीसगढ़ ) में 28 .10 .2018 रविवार को रात्रि 07 .00 बजे हो रहा

 

 

सबका संदेस न्यूज छत्तीसगढ़ कवर्धा- अनन्त श्री विभूषित ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवं द्वारकशारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शङ्कराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज श्री का मङ्गलमय दिव्य पदार्पण भाई चन्द्रप्रकाश उपाध्याय जी के यहाँ शंकराभवनम शाँति दीप कालोनी कवर्धा ( छत्तीसगढ़ ) में 28 .10 .2018 रविवार को रात्रि 07 .00 बजे हो रहा है ।जगद्गुरु जी 30 .10 .2018 मंगलवार को दोपहर 02 .00 बजे बिलासपुर के लिए प्रस्थान करेंगे । आप सब गुरुदेव जी के दिव्य दर्शन के लिए सादर आमंत्रीत हैं।

पण्डित देव दत्त शर्मा

 

 

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17 मार्च 2018 को शनिश्चरी अमावस्या है।हिन्दू धर्म में अमावस्या का विशेष महत्व है और अमावस्या यदि शनिवार के दिन पड़े तो इसका महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है।

शनि अमावस्या 2018

17 मार्च 2018 को शनिश्चरी अमावस्या है।हिन्दू धर्म में अमावस्या का विशेष महत्व है और अमावस्या यदि शनिवार के दिन पड़े तो इसका महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है।और इस दिन पितृपक्ष की भी आमवस्या पड़े फिर तो सोने में सुहागा वाली बात हो जाती है।तो दोस्तो इस बार ऐसा ही हो रहा है।

‘शनिश्चरीअमावस्या’, को ‘पितृकार्य अमावस्या’भी कहते है।शनि अमावस्या के दिन श्राद्ध आदि कर्म पूर्ण करने से व्यक्ति पितृदोष आदि से मुक्त हो जाता है और उसे कार्यों में सफलता मिलती है।’ढैय्या’ तथा ‘साढ़ेसाती’ सहित शनि संबंधी अनेक बाधाओं से मुक्ति पाने के लिए ‘शनि अमावस्या’ एक दुर्लभ दिन व महत्त्वपूर्ण समय होता है।

पौराणिक धर्म ग्रंथों और हिन्दू मान्यताओं में ‘शनि अमावस्या’ की काफ़ी महत्ता बतलाई गई है। इस दिन व्रत, उपवास, और दान आदि करने का बड़ा पुण्य मिलता है।

‘शनि अमावस्या’ के दिन पवित्र नदी के जल से या नदी में स्नान कर शनि देव का आवाहन और दर्शन करना चाहिए। शनि देव को नीले रंग के पुष्प, बिल्व वृक्ष के बिल्व पत्र, अक्षत अर्पण करें।

भगवान शनि देव को प्रसन्न करने हेतु शनि मंत्र

ॐ शं शनैश्चराय नम:, अथवा

ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नम: ।

मंत्र का जाप करना चाहिए।

इस दिन सरसों के तेल, उड़द की दाल, काले तिल, कुलथी, गुड़ शनि यंत्र और शनि संबंधी समस्त पूजन सामग्री को शनि देव पर अर्पित करना चाहिए और शनि देव का तैलाभिषेक करना चाहिए।छाया दान भी करें।

शनि अमावस्या के दिन ‘शनि चालीसा’, ‘हनुमान चालीसा’ या ‘बजरंग बाण’ का पाठ अवश्य करना चाहिए।जो लोग इस दिन यात्रा में जा रहे हैं और उनके पास समय की कमी है,

वह सफर में ही ‘कोणस्थ: पिंगलो बभ्रु: कृष्णौ रौद्रोंतको यम:। सौरी: शनिश्चरो मंद:पिप्पलादेन संस्तुत:।।’

मंत्र का जप करते हैं तो शनि देव की पूर्ण कृपा प्राप्त होती है।

जिन दोस्तों के कुंडली में शनि ग्रह पीड़ित हो और शनि की महादशा चल रहा हो या साढ़े साती या ढैया चल रहा हो और जिनके कुंडली में पितृदोष और काल सर्पयोग हो तो वो लोग ये मौका हाथ से न जाने दे शनि देव को प्रसन्न करके दुःखो से राहत पाये।

इस अवसर पर शनि देव को प्रसन्न करने के लिए हम आपको पांच शनि मंत्रो से अवगत करा रहे है। इन मंत्रो मे से किसी भी मन्त्र काजाप अपने आवश्यकता अनुसार इस शनिश्चरी अमावस्या से शुरू कर प्रतिदिन कर के देखिये आप चमत्कारिक रूप से इनके लाभ को स्वयं महसूस करेंगे।

(1)प्रतिदिन श्रध्दानुसार ‘शनि गायत्री’ का जाप करने से घर में सदैव मंगलमय वातावरण बना रहता है।शनि मंत्र व स्तोत्र सर्वबाधा निवारक है।

वैदिक गायत्री मंत्र-
“ॐ भगभवाय विद्महे मृत्युरुपाय धीमहि, तन्नो शनि: प्रचोदयात्।”

(2)वैदिक शनि मंत्र-यह शनि देव को प्रसन्न करने का सबसे पवित्र और अनुकूल मंत्र है।
इसकी दो माला सुबह शाम करने से शनि देव की भक्ति व प्रीति मिलती है।
“ॐ शन्नोदेवीरमिष्टय आपो भवन्तु पीतये शंय्योरभिस्रवन्तुन:।”

(3)पौराणिक मन्त्र:
नीलांजनम समाभासं रविपुत्रम यमाग्रजं।
छायामार्तंड सम्भूतं तम नमामी शनैश्चरम।।

(4)कष्ट निवारण शनि मंत्र नीलाम्बर- इस मंत्र से अनावश्यक समस्याओं से छुटकारा मिलता है। प्रतिदिन एक माला सुबह शाम करने से शत्रु चाह कर भी नुकसान नहीं पहुँचा पायेगा।

“शूलधर: किरीटी गृघ्रस्थितस्त्रसकरो धनुष्मान्।
चर्तुभुज: सूर्यसुत: प्रशान्त: सदाऽस्तुं मह्यं वरंदोऽल्पगामी॥”

(5)सुख-समृद्धि दायक शनि मंत्र- इस शनि स्तुति का प्रात:काल पाठ करने से शनि जनित कष्ट नहीं व्यापते और सारा दिन सुख पूर्वक बीतता है।

“कोणस्थ:पिंगलो वभ्रु: कृष्णौ रौद्रान्तको यम:।
सौरि: शनैश्चरौ मंद: पिप्पलादेन संस्तुत:॥”

(6)शनि पत्नी नाम स्तुति- यह बहुत ही अद्भुत और रहस्यमय स्तुति है। यदि कारोबारी, पारिवारिक या शारीरिक समस्या हो, तब इस मंत्र का विधिविधान से जाप और अनुष्ठान किया जाये तो कष्ट कोसों दूर रहेंगे।

“ॐ शं शनैश्चराय नम: ध्वजनि धामिनी चैव कंकाली कलहप्रिया।
कंटकी कलही चाऽथ तुरंगी महिषी अजा॥
ॐ शं शनैश्चराय नम:”।

॥ श्रीशनि वज्रपंजर कवचम् ॥

शनि कवच का पाठ शनि कृत सभी कष्टों से मुक्ति प्रदान करने वाला और शनि देव को प्रसन्न करने वाला है।

यदि जन्म चक्र में द्वितीय, सप्तम, अष्टम द्वादश अथवा रोग स्थान पर स्थित शनि पीड़ा देता हो अथवा शनि की दशा, ढैय्या एवम साढ़ेसाती से पीड़ित हों तो उक्त कवच का पाठ शनि पीड़ाओं से मुक्ति प्रदान करता है।

श्री गणेशाय नमः ॥

विनियोगः ।
ॐ अस्य श्रीशनैश्चरवज्रपञ्जर कवचस्य कश्यप ऋषिः,
अनुष्टुप् छन्दः, श्री शनैश्चर देवता,
श्रीशनैश्चर प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ॥

ऋष्यादि न्यासः ।
श्रीकश्यप ऋषयेनमः शिरसि ।
अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे ।
श्रीशनैश्चर देवतायै नमः हृदि ।
श्रीशनैश्चरप्रीत्यर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ॥

ध्यानम् ।
नीलाम्बरो नीलवपुः किरीटी गृध्रस्थितस्त्रासकरो धनुष्मान् ।
चतुर्भुजः सूर्यसुतः प्रसन्नः सदा मम स्याद् वरदः प्रशान्तः ॥ १॥

ब्रह्मा उवाच ॥

शृणुध्वमृषयः सर्वे शनिपीडाहरं महत् ।
कवचं शनिराजस्य सौरेरिदमनुत्तमम् ॥ २॥

कवचं देवतावासं वज्रपंजरसंज्ञकम् ।
शनैश्चरप्रीतिकरं सर्वसौभाग्यदायकम् ॥ ३॥

ॐ श्रीशनैश्चरः पातु भालं मे सूर्यनन्दनः ।
नेत्रे छायात्मजः पातु पातु कणौं यमानुजः ॥ ४॥

नासां वैवस्वतः पातु मुखं मे भास्करः सदा ।
स्निग्धकण्ठश्च मे कण्ठं भुजौ पातु महाभुजः ॥ ५॥

स्कन्धौ पातु शनिश्चैव करौ पातु-शुभप्रदः ।
वक्षः पातु यमभ्राता कुक्षिं पात्वसितस्तथा ॥ ६॥

नाभिं ग्रहपतिः पातु मन्दः पातु कटिं तथा ।
ऊरू ममान्तकः पातु यमो जानुयुगं तथा ॥ ७॥

पादौ मन्दगतिः पातु सर्वांगं पातु पिप्पलः ।
अंगोपांगानि सर्वाणि रक्षेन् मे सूर्यनन्दनः ॥ ८॥

इत्येतत् कवचं दिव्यं पठेत् सूर्यसुतस्य यः ।
न तस्य जायते पीडा प्रीतो भवति सूर्यजः ॥ ९॥

व्यय-जन्म-द्वितीयस्थो मृत्युस्थानगतोऽपि वा ।
कलत्रस्थो गतो वाऽपि सुप्रीतस्तु सदा शनिः ॥ १०॥

अष्टमस्थे सूर्यसुते व्यये जन्मद्वितीयगे ।
कवचं पठते नित्यं न पीडा जायते क्वचित् ॥ ११॥

इत्येतत्कवचं दिव्यं सौरेर्यन्निर्मितं पुरा ।
द्वादशाऽष्टमजन्मस्थदोषान्नाशयते सदा ।
जन्मलग्नस्थितान् दोषान् सर्वान्नाशयते प्रभुः ॥ १२॥

॥ इति श्री ब्रह्माण्डपुराणे ब्रह्म-नारदसंवादे
शनिवज्रपंजरकवचम् सम्पूर्णम् ॥

जो लोग संस्कृत में जप या पाठ नहीं कर सकते वे शनि चालीसा का पाठ अवश्य करें

श्री शनि चालीसा

दोहा

जय-जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महराज।
करहुं कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज।।

चौपाई

जयति-जयति शनिदेव दयाला।
करत सदा भक्तन प्रतिपाला।।
चारि भुजा तन श्याम विराजै।
माथे रतन मुकुट छवि छाजै।।
परम विशाल मनोहर भाला।
टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला।।
कुण्डल श्रवण चमाचम चमकै।
हिये माल मुक्तन मणि दमकै।।
कर में गदा त्रिशूल कुठारा।
पल विच करैं अरिहिं संहारा।।
पिंगल कृष्णो छाया नन्दन।
यम कोणस्थ रौद्र दुःख भंजन।।
सौरि मन्द शनी दश नामा।
भानु पुत्रा पूजहिं सब कामा।।
जापर प्रभु प्रसन्न हों जाहीं।
रंकहु राउ करें क्षण माहीं।।
पर्वतहूं तृण होई निहारत।
तृणहंू को पर्वत करि डारत।।
राज मिलत बन रामहि दीन्हा।
कैकइहूं की मति हरि लीन्हा।।
बनहूं में मृग कपट दिखाई।
मात जानकी गई चुराई।।
लषणहि शक्ति बिकल करि डारा।
मचि गयो दल में हाहाकारा।।
दियो कीट करि कंचन लंका।
बजि बजरंग वीर को डंका।।
नृप विक्रम पर जब पगु धारा।
चित्रा मयूर निगलि गै हारा।।
हार नौलखा लाग्यो चोरी।
हाथ पैर डरवायो तोरी।।
भारी दशा निकृष्ट दिखाओ।
तेलिहुं घर कोल्हू चलवायौ।।
विनय राग दीपक महं कीन्हो।
तब प्रसन्न प्रभु ह्नै सुख दीन्हों।।
हरिशचन्द्रहुं नृप नारि बिकानी।
आपहुं भरे डोम घर पानी।।
वैसे नल पर दशा सिरानी।
भूंजी मीन कूद गई पानी।।
श्री शकंरहि गहो जब जाई।
पारवती को सती कराई।।
तनि बिलोकत ही करि रीसा।
नभ उड़ि गयो गौरि सुत सीसा।।
पाण्डव पर ह्नै दशा तुम्हारी।
बची द्रोपदी होति उघारी।।
कौरव की भी गति मति मारी।
युद्ध महाभारत करि डारी।।
रवि कहं मुख महं धरि तत्काला।
लेकर कूदि पर्यो पाताला।।
शेष देव लखि विनती लाई।
रवि को मुख ते दियो छुड़ाई।।
वाहन प्रभु के सात सुजाना।
गज दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना।।
जम्बुक सिंह आदि नख धारी।
सो फल ज्योतिष कहत पुकारी।।
गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं।
हय ते सुख सम्पत्ति उपजावैं।।
गर्दभहानि करै बहु काजा।
सिंह सिद्धकर राज समाजा।।
जम्बुक बुद्धि नष्ट करि डारै।
मृग दे कष्ट प्राण संहारै।।
जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी।
चोरी आदि होय डर भारी।।
तैसहिं चारि चरण यह नामा।
स्वर्ण लोह चांदी अरु ताम्बा।।
लोह चरण पर जब प्रभु आवैं।
धन सम्पत्ति नष्ट करावैं।।
समता ताम्र रजत शुभकारी।
स्वर्ण सर्व सुख मंगल भारी।।
जो यह शनि चरित्रा नित गावै।
कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै।।
अद्भुत नाथ दिखावैं लीला।
करैं शत्राु के नशि बल ढीला।।
जो पंडित सुयोग्य बुलवाई।
विधिवत शनि ग्रह शान्ति कराई।।
पीपल जल शनि-दिवस चढ़ावत।
दीप दान दै बहु सुख पावत।।
कहत राम सुन्दर प्रभु दासा।
शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा।।

दोहा

प्रतिमा श्री शनिदेव की, लोह धातु बनवाय।
प्रेम सहित पूजन करै, सकल कष्ट कटि जाय।।
चालीसा नित नेम यह, कहहिं सुनहिं धरि ध्यान।
नि ग्रह सुखद ह्नै, पावहिं नर सम्मान।।

आज के दिन दान का भी बहुत महत्व होता है।

शनि की कोई भी वस्तु, जैसे- काला तिल, लोहे की वस्तु, काला चना, कंबल, नीला फूल दान करना तिल से बने पकवान, उड़द की दाल से बने पकवान गरीबों को दान करें।उड़द दाल की खिचड़ी दरिद्र नारायण को दान करें

अजीत शाष्त्री जी रायपुर छतीसगढ़ से

 

कैसे करे माता की पूजन व कलश स्थापना आइए जाने

 

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चैत्र नवरात्रि घटस्थापना….पण्डित देव दत्त शर्मा -सहसपुर लोहारा, कवर्धा

१८ मार्च २०१८ रविवार के शुभ मुहूर्त जैसे घटस्थापन, कलश-पूजन श्रीदुर्गा पूजादि करना चा‍हिए।
१८ मार्च २०१८ रविवार घटता हुआ
मुहूर्त समय.. ०६:२३ से ०७:४५
अवधि .. १ घण्टे २२ मिनट..

प्रतिपदा की तारीख प्रारम्भ…
१७ मार्च २०१८ को १८:४१ बजे।

प्रतिपदा तिथि समाप्ति
१८ मार्च २०१८ को १८:३१ बजे।

नवरात्रका प्रयोग प्रारम्भ करनेके पहले सुगन्धयुक्त तैलके उद्वर्तनादिसे मङ्गलस्त्रान करके नित्यकर्म करे और स्थिर शान्तिके पवित्र स्थानमें शुभ मृत्तिकाकी वेदी बनाये । उसमें जौ और गेहूँ – इन दोनोंको मिलाकर बोये । वहीं सोने, चाँदी, ताँबे या मिट्टीके कलशको यथाविधि स्थापन करके गणेशादिका पूजन और पुण्याहवाचन करे और पीछे देवी ( या देव ) के समीप शुभासनपर पूर्व या उत्तर मुख बैठकर….

“मम महामायाभगवती वा मायाधिपति भगवत प्रीतये आयुर्बलवित्तारोयसमादरादिप्राप्तये वा नवरात्रव्रतमहं करिष्ये ।

यह संकल्प करके मण्डलके मध्यमें रखे हु‌ए कलशपर सोने, चाँदी, धातु, पाषाण, मृत्तिका या चित्रमय मूर्ति विराजमान करे और उसका आवाहन आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्त्रान, वस्त्र, गन्ध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, आचमन, ताम्बूल, नीराजन, पुष्पाञ्जलि, नमस्कार और प्रार्थना आदि उपचारोंसे पूजन करे ।

स्त्री हो या पुरुष, सबको नवरात्र करना चाहिये । यदि कारणवश स्वयं न कर सकें तो प्रतिनिधि ( पति पत्नी, ज्येष्ठ पुत्र, सहोदर या ब्राह्मण ) द्वारा करायें । नवरात्र नौ रात्रि पूर्ण होनेसे पूर्ण होता है । इसलिये यदि इतना समय न मिले या सामर्थ्य न हो तो सात, पाँच, तीन या एक दिन व्रत करे और व्रतमें भी उपवास, अयाचित, नक्त या एकभुक्त जो बन सके यथासामर्थ्य वही कर ले ।

यदि सामर्थ्य हो तो नौ दिनतक नौ ( और यदि सामर्थ्य न हो तो सात, पाँच, तीन या एक ) कन्या‌ओंको देवी मानका उनको गन्ध – पुष्पादिसे अर्चित करके भोजन कराये और फिर आप भोजन करे । व्रतीको चाहिये कि उन दिनोंमें भुशयन, मिताहार, ब्रह्मचर्यका पालन, क्षमा, दया, उदारता एवं उत्साहदिकी वृद्धि और क्रोध, लोभ, मोहादिका त्याग रखे ।

चैत्रके नवरात्रमें शक्तिकी उपासना तो प्रसिद्ध ही हैं, साथ ही शक्तिधरकी उपासना भी की जाती है । उदाहरणार्थ एक ओर देवीभागवत कालिकापुराण, मार्कण्डेयपुराण, नवार्णमन्त्नके पुरश्चरण और दुर्गापाठकी शतसहस्त्रायुतचण्डी आदि होते हैं

कलश स्थापना विधि:

नवरात्रि में कलश स्थापना देव-देवताओं के आह्वान से पूर्व की जाती है। कलश स्थापना करने से पूर्व आपको कलश और खेतरी को तैयार करना होगा जिसकी सम्पूर्ण विधि नीचे दी गयी है

सबसे पहले मिट्टी के बड़े पात्र में थोड़ी सी मिट्टी डालें। और उसमे जवारे के बीज डाल दें।

अब इस पात्र में दोबारा थोड़ी मिटटी और डालें। और फिर बीज डालें। उसके बाद सारी मिट्टी पात्र में दाल दें और फिर बीज डालकर थोडा सा जल डालें।

(ध्यान रहे इन बीजों को पात्र में इस तरह से लगाएं की उगने पर यह ऊपर की तरफ उगें। यानी बीजों को खड़ी अवस्था में लगायें। और ऊपर वाली लेयर में बीज अवश्य डालें।

अब कलश और उस पात्र की गर्दन पर मोली बांध दें। साथ ही तिलक भी लगाएं।

इसके बाद कलश में गंगा जल भर दें।

इस जल में सुपारी, इत्र, दूर्वा घास, अक्षत और सिक्का भी दाल दें।

अब इस कलश के किनारों पर ५ अशोक के पत्ते रखें। और कलश को ढक्कन से ढक दें।

अब एक नारियल लें और उसे लाल कपडे या कल चुन्नी में लपेट लें। चुन्नी के साथ इसमें कुछ पैसे भी रखें।

इसके बाद इस नारियल और चुन्नी को रक्षा सूत्र से बांध दें।

तीनों चीजों को तैयार करने के बाद सबसे पहले जमीन को अच्छे से साफ़ करके उसपर मिट्टी का जौ वाला पात्र रखें। उसके ऊपर मिटटी का कलश रखें और फिर कलश के ढक्कन पर नारियल रख दें।

आपकी कलश स्थापना सम्पूर्ण हो चुकी है। इसके बाद सभी देवी देवताओं का आह्वान करके विधिवत नवरात्रि पूजन करें। इस कलश को आपको नौ दिनों तक मंदिर में ही रखे देने होगा। बस ध्यान रखें की खेतरी में सुबह शाम आवश्यकतानुसार पानी डालते रहें।

चैत्र नवरात्रि २०१८ की महत्वपूर्ण तिथियां:

नवरात्रि का दिन तारीख (वार) तिथि
देवी का पूजन

नवरात्रि दिन १ :
१८ मार्च २०१८ (रविवार)
प्रतिपदा शैलपुत्री पूजा, कलश स्थापना

नवरात्रि दिन २ :
१९ मार्च २०१८ (सोमवार) द्वितीया
ब्रह्मचारिणी पूजा

नवरात्रि दिन ३ :
२० मार्च २०१८ (मंगलवार) तृतीया
चंद्रघंटा पूजा

नवरात्रि दिन ४ :
२१ मार्च २०१८ (बुधवार) चतुर्थी
कुष्मांडा पूजा

नवरात्रि दिन ५ :
२२ मार्च २०१८ (गुरुवार) पंचमी
स्कंदमाता पूजा

नवरात्रि दिन ६ :
२३ मार्च २०१८ (शुक्रवार) षष्ठी
कात्यायनी पूजा

नवरात्रि दिन ७ :
२४ मार्च २०१८ (शनिवार) सप्तमी, अष्टमी
कालरात्रि पूजा, महागौरी पूजा

नवरात्रि दिन ८ :
२५ मार्च २०१८ (रविवार) अष्टमी, नवमी
राम नवमि

नवरात्रि दिन ९ :
२६ मार्च २०१८ (सोमवार) दशमी
नवरात्रि पारण

नवरात्री में नौ देवियों की पूजा होती है ये नौ देवियाँ है….

१. शैलपुत्री

“शैल” का अर्थ है पहाड़। चूंकि माँ दुर्गा पर्वतों के राजा, हिमालय के यहाँ पैदा हुई थीं, इसी वजह से उन्हे पर्वत की पुत्री यानि “शैलपुत्री” कहा जाता है।

२. ब्रह्मचारिणी

इसका तात्पर्य है- तप का पालन करने वाली या फिर तप का आचरण करने वाली। इसका मतलब यह भी होता है, कि एक में ही सबका समा जाना। इसका यह भी अर्थ निकलता है,कि यह सम्पूर्ण संसार माँ दुर्गा का एक छोटा सा अंश मात्र ही है।

३. चंद्रघंटा

माता के इस रूप में उनके मस्तक पर घण्टे के आकार का अर्धचन्द्र अंकित है। इसी वजह से माँ दुर्गा का नाम चंद्रघण्टा भी है।

४. कूष्मांडा

इसका अर्थ समझने के लिए पहले इस शब्द को थोड़ा तोड़ा जाए। ‘कू’ का अर्थ होता है- छोटा। ‘इश’ का अर्थ- ऊर्जा एवं ‘अंडा’ का अर्थ- गोलाकार। इन्हें अगर मिलाया जाए तो इनका यही अर्थ है, कि संसार की छोटी से छोटी चीज़ में विशाल रूप लेने की क्षमता होती है।

५. स्कंदमता

दरअसल भगवान शिव और पार्वती के पुत्र कार्तिकेय का एक अन्य नाम स्कन्द भी है। अतः भगवान स्कन्द अर्थात कार्तिकेय की माता होने के कारण मां दुर्गा के इस रूप को स्कन्दमाता के नाम से भी लोग जानते हैं।

६. कात्यायनी

एक कथा के अनुसार महर्षि कात्यायन की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर उनके वरदान स्वरूप माँ दुर्गा उनके यहाँ पुत्री के रूप में पैदा हुई थीं। चूंकि महर्षि कात्यायन ने ही सबसे पहले माँ दुर्गा के इस रूप की पूजा की थी, अतः महर्षि कात्यायन की पुत्री होने के कारण माँ दुर्गा कात्यायनी के नाम से भी जानी जाती हैं।

७. कालरात्रि

मां दुर्गा के इस रूप को अत्यंत भयानक माना जाता है, यह सर्वदा शुभ फल ही देता है, जिस वजह से इन्हें शुभकारी भी कहते हैं। माँ का यह रूप प्रकृति के प्रकोप के कारण ही उपजा है।

८. महागौरी

माँ दुर्गा का यह आठवां रूप उनके सभी नौ रूपों में सबसे सुंदर है। इनका यह रूप बहुत ही कोमल, करुणा से परिपूर्ण और आशीर्वाद देता हुआ रूप है, जो हर एक इच्छा पूरी करता है.

९. सिद्धिदात्री

माँ दुर्गा का यह नौंवा और आखिरी रूप मनुष्य को समस्त सिद्धियों से परिपूर्ण करता है। इनकी उपासना करने से उनके भक्तों की कोई भी इच्छा पूर्ण हो सकती है। माँ का यह रूप आपके जीवन में कोई भी विचार आने से पूर्व ही आपके सारे काम को पूरा कर सकता है।

पूजा का कृत्य प्रारम्भ। प्रातःकाल नित्य स्नानादि कृत्य से फुरसत होकर पूजा के लिए पवित्र वस्त्र पहन कर उपरोक्त पूजन सामग्री व श्रीदुर्गासप्तशती की पुस्तक ऊँचे आसन में रखकर, पवित्र आसन में पूर्वाविमुख या उत्तराभिमुख होकर भक्तिपूर्वक बैठे और माथे पर चन्दन का लेप लगाएं, पवित्री मंत्र बोलते हुए पवित्री करण, आचमन, आदि को विधिवत करें। तत्पश्चात् दायें हाथ में कुश आदि द्वारा पूजा का संकल्प करे। आज ही नवरात्री मे नवदुर्गा पूजन हेतु अपना स्थान सुरक्षित करे |

सभी प्रकार की कामनाओ हेतु :

०१)
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यषो देहि द्विषो जहि।।

अगर आप की अनावश्यक विलम्ब हो रहा है तो इस मंत्र का प्रयोग करते हुए पाठ करे

०२)
पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्। तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्।।

रोग से छुटकारा पाने के लिए:

०३)
रोगानषेषानपहंसि तुष्टा रूष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति।

पूजन करने की विधि: 
मंत्रों से तीन बार आचमन करें।

०४) 
मंत्र ॐ केशवाय नमः,
ॐ नारायणाय नमः,
ॐ माधवाय नमः

०५) 
हृषिकेषाय नमः बोलते हुए हाथ धो लें।

०६) आसन धारण के मंत्र: 
ॐ पृथ्वि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता। त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरू चासनम्।।

०७) पवित्रीकरण हेतु मंत्र:
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपि वा। यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षंतद्बाह्याभ्यन्तरं शुचि।।

०८) चंदन लगाने का मंत्रः 
ॐ आदित्या वसवो रूद्रा विष्वेदेवा मरूद्गणाः। तिलकं ते प्रयच्छन्तु धर्मकामार्थसिद्धये।।

रक्षा सूत्र मंत्र (पुरूष को दाएं तथा स्त्री को बांए हाथ में बांधे)

०९) मंत्रः
ॐ येनबद्धोबली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।तेनत्वाम्अनुबध्नामि रक्षे माचल माचल ।।

१०) दीप जलाने का मंत्रः
ॐ ज्योतिस्त्वं देवि लोकानां तमसो हारिणी त्वया। पन्थाः बुद्धिष्च द्योतेताम् ममैतौ तमसावृतौ।।

११) संकल्प की विधिः
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः, ॐ नमः परमात्मने, श्रीपुराणपुरूषोत्तमस्य श्रीविष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपराद्र्धे श्रीष्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे- ऽष्टाविंषतितमे कलियुगे प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे

श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलप्राप्तिकामः अमुकगोत्रोत्पन्नः अमुकषर्मा अहं ममात्मनः सपुत्रस्त्रीबान्धवस्य श्रीनवदुर्गानुग्रहतोल

आदि मंत्रो को शुद्धता से बोलते हुए शास्त्री विधि से पूजा पाठ का संकल्प लें।

प्रथमतः श्री गणेश जी का ध्यान, आवाहन, पूजन करें।

१२) श्री गणश मंत्र: 
ॐ वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ।
निर्विध्नं कुरू मे देव सर्वकायेषु सर्वदा।।

कलश स्थापना के नियम :–

पूजा हेतु कलश सोने, चाँदी, तांबे की धातु से निर्मित होते हैं, असमर्थ व्यक्ति मिट्टी के कलश का प्रयोग करत सकते हैं। ऐसे कलश जो अच्छी तरह पक चुके हों जिनका रंग लाल हो वह कहीं से टूटे-फूटे या टेढ़े न हो, दोष रहित कलश को पवित्र जल से धुल कर उसे पवित्र जल गंगा जल आदि से पूरित करें। कलश के नीचे पूजागृह में रेत से वेदी बनाकर जौ या गेहूं को बौयें और उसी में कलश कुम्भ के स्थापना के मंत्र बोलते हुए उसे स्थाति करें। कलश कुम्भ को विभिन्न प्रकार के सुगंधित द्रव्य व वस्त्राभूषण अंकर सहित पंचपल्लव से आच्छादित करें और पुष्प, हल्दी, सर्वोषधी अक्षत कलश के जल में छोड़ दें। कुम्भ के मुख पर चावलों से भरा पूर्णपात्र तथा नारियल को स्थापित करें। सभी तीर्थो के जल का आवाहन कुम्भ कलश में करें।

कलश स्थापन मुहूर्त।
सूर्योदय: ०६, १९ ,,
सूर्यास्त: १८ ,,२३

चन्द्रोदय: ०६ ,,५३
चन्द्रास्त: १९,,१४

१८ मार्च सन् २०१८ विक्रमी संवत् २०७५,
दिन रविवार, प्रात: ०६:२३ से ०७:४५ ,,
समय १ घण्टा १, २२

के बाद अभिजीत मुहूर्त मे लगभग दोपहर ११:५७ से १२:४७ तक रहेगा।

*१३) आवाहन मंत्र करें: 
ॐ कलषस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रूद्रः समाश्रितः।
मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः।।

गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वति ।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू ।।

षोडषोपचार पूजन प्रयोग विधि –

१४) आसन (पुष्पासनादि): 
ॐ अनेकरत्न-संयुक्तं नानामणिसमन्वितम्। कात्र्तस्वरमयं दिव्यमासनं प्रतिगृह्यताम्।।

१५) पाद्य (पादप्रक्षालनार्थ जल):
ॐ तीर्थोदकं निर्मलऽचसर्वसौगन्ध्यसंयुतम्। पादप्रक्षालनार्थाय दत्तं तेप्रतिगृह्यताम्।।

१६) अघ्र्य (गंध पुष्प्युक्त जल): 
ॐ गन्ध-पुष्पाक्षतैर्युक्तं अध्र्यंसम्मपादितं मया।गृह्णात्वेतत्प्रसादेन अनुगृह्णातुनिर्भरम्।।

१७) आचमन (सुगन्धित पेय जल): 
ॐ कर्पूरेण सुगन्धेन वासितं स्वादु षीतलम्। तोयमाचमनायेदं पीयूषसदृषं पिब।।

१८) स्नानं (चन्दनादि मिश्रित जल):
ॐ मन्दाकिन्याः समानीतैः कर्पूरागरूवासितैः।पयोभिर्निर्मलैरेभिःदिव्यःकायो हि षोध्यताम्।।

१९) वस्त्र (धोती-कुत्र्ता आदि):
ॐ सर्वभूषाधिके सौम्ये लोकलज्जानिवारणे। मया सम्पादिते तुभ्यं गृह्येतां वाससी षुभे।।

२०) आभूषण (अलंकरण):
ॐ अलंकारान् महादिव्यान् नानारत्नैर्विनिर्मितान्। धारयैतान् स्वकीयेऽस्मिन् षरीरे दिव्यतेजसि।।

२१) गन्ध (चन्दनादि):
ॐ श्रीकरं चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम्। वपुषे सुफलं ह्येतत् षीतलं प्रतिगृह्यताम्।।

२२) पुष्प (फूल):
ॐ माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि भक्त्तितः।
मयाऽऽहृतानि पुष्पाणि पादयोरर्पितानि ते।।

२३) धूप (धूप):
ॐ वनस्पतिरसोद्भूतः सुगन्धिः घ्राणतर्पणः।सर्वैर्देवैः ष्लाघितोऽयं सुधूपः प्रतिगृह्यताम्।।

२४) दीप (गोघृत):
ॐ साज्यः सुवर्तिसंयुक्तो वह्निना द्योतितो मया।गृह्यतां दीपकोह्येष त्रैलोक्य-तिमिरापहः।।

*२५) नैवेद्य (भोज्य)*
ॐ षर्कराखण्डखाद्यानि दधि-क्षीर घृतानि च। रसनाकर्षणान्येतत् नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम्।।

*२६) आचमन (जल)*
ॐ गंगाजलं समानीतं सुवर्णकलषस्थितम्। सुस्वादु पावनं ह्येतदाचम मुख-षुद्धये।।

*२७) दक्षिणायुक्तताम्बूल(द्रव्य पानपत्ता): 
ॐ लवंगैलादि-संयुक्तं ताम्बूलं दक्षिणां तथा। पत्र-पुष्पस्वरूपां हि गृहाणानुगृहाण माम्।।

२८) आरती (दीप से): 
ॐ चन्द्रादित्यौ च धरणी विद्युदग्निस्तथैव च। त्वमेव सर्व-ज्योतींषि आर्तिक्यं प्रतिगृह्यताम्।।

२९) परिक्रमाः
ॐ यानि कानि च पापानि जन्मांतर-कृतानि च। प्रदक्षिणायाः नष्यन्तु सर्वाणीह पदे पदे।।

भागवती एवं उसकी प्रतिरूप देवियों की एक परिक्रमा करनी चाहिए।यदि चारों ओर परिक्रमा का स्थान न हो तो आसन पर खड़े होकर दाएं घूमना चाहिए।

३०) क्षमा प्रार्थना: 
ॐ आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्। पूजां चैव न जानामि भक्त एष हि क्षम्यताम्।। अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम। तस्मात्कारूण्यभावेन भक्तोऽयमर्हति क्षमाम्।। मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं तथैव च। यत्पूजितं मया ह्यत्र परिपूर्ण तदस्तु मे।।

३१ )
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पष्यन्तु मा कष्चिद् दुःख-भाग्भवेत् ।

चैत्र नवरात्रि की हार्दिक बधाई शुभकामनाएँ पण्डित देव दत्त शर्मा सहसपुर लोहारा, कवर्धा

 

सबका संदेश 9425569117

इस नवरात्रि में क्या खाए और क्या चीज का परहेज करें

छतीसगढ़ सबका संदेस न्यूज़- चैत्र नवरात्रि का आरम्भ 18 मार्च से हो रहा है और इसी के साथ हिन्दू नववर्ष की भी शुरुआत होगी। नवरात्रि पर मां दुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजा की जाती है। इस दौरान लोग साफ-सफाई और खान-पान की चीजों का विशेष ध्यान रखते हैं। इन नौ दिनों तक लोग सादा आहार ग्रहण करते हैं। कुछ लोग नवरात्रि के पूरे नौ दिनों तक व्रत रखते है। ऐसे मे इन नौ दिनों में क्या खाना चाहिए और क्या नहीं आइए जानते हैं।  कुट्टू के आटे को नवरात्रि के व्रत के दौरान सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है। इसके आटे का हलावा, पूरी और खिचड़ी बनाकर खाया जाता है। कुट्टू के आटे से बनी चीजें खाने से भूख कम लगती है।  सिंघारे का आटा व्रत में सिंघारे के आटे की पूरियां और हलवा बना कर खाया जाता है। सिंघारे के आटे को व्रत में बहुत शुभ माना जाता है। आलू और टमाटर  वैसे तो आलू हर एक व्रत में खाया जाता है लेकिन नवरात्रि पर आलू से बनी चीजें ज्यादा पसंद किया जाता है। इसमें बिना नमक के आलू की सब्जी बनकर खाते हैं। शकरकंद  आलू के अलावा शकरकंद भी व्रत में बहुत खाया जाता है। नवरात्रि के उपवास में साबूदाने से बना व्यंजन दही के साथ खाया जा सकता है। कुट्टू के आटे से बनी पूरी और आलू की सब्जी दही के साथ ले सकते हैं।  ड्राई फूट और मखाना नवरात्रि में ड्राई फूट से बनी चीजें बहुत पसंद की जाती है। व्रत में मूंगफली और मखाना को तलकर खाया जाता है।  नवरात्रि पर केवल फलाहार ही खाया जाता है। नवरात्रि पर नमक और प्याज लहसुन से बनी चीजें नहीं खानी चाहिए। भूलकर भी इस दौरान मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए।    

१८ मार्च २०१८ रविवार को हिन्दू नववर्ष आ रहा है। पण्डित देव दत्त शर्मा

नव संवत्सर २०७५ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा , १८ मार्च २०१८ से प्रारंभ हो रहा है । पण्डित देव दत्त शर्मा सहसपुर लोहारा

यही हमारा नया वर्ष है, इसे धूमधाम से मनाए –
हम बताते है *भारतीय नववर्ष* की विशेषता –
ग्रंथो में लिखा है कि जिस दिन सृष्टि का चक्र प्रथम बार विधाता ने प्रवर्तित किया, उस दिन चैत्र शुदी १ रविवार था। हमारे लिए आने वाला *संवत्सर २०७५* बहुत ही भाग्यशाली होगा , क़्योंकि इस वर्ष भी *चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को रविवार है*, शुदी एवम ‘शुक्ल पक्ष एक ही है।

चैत्र के महीने के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि (प्रतिपद या प्रतिपदा) को सृष्टि का आरंभ हुआ था।हमारा *नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा* को शरू होता है| इस दिन ग्रह और नक्षत्र मे परिवर्तन होता है | हिन्दी महीने की शुरूआत इसी दिन से होती है |

पेड़-पोधों मे फूल ,मंजर ,कली इसी समय आना शुरू होते है , वातावरण मे एक नया उल्लास होता है जो मन को आह्लादित कर देता है | जीवो में धर्म के प्रति आस्था बढ़ जाती है | इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण किया था | भगवान विष्णु जी का प्रथम अवतार भी इसी दिन हुआ था | नवरात्र की शुरुअात इसी दिन से होती है | जिसमे हमलोग उपवास एवं पवित्र रह कर नव वर्ष की शुरूआत करते है |

परम पुरूष अपनी प्रकृति से मिलने जब आता है तो सदा चैत्र में ही आता है। इसीलिए सारी सृष्टि सबसे ज्यादा चैत्र में ही महक रही होती है। वैष्णव दर्शन में चैत्र मास भगवान नारायण का ही रूप है। चैत्र का आध्यात्मिक स्वरूप इतना उन्नत है कि इसने वैकुंठ में बसने वाले ईश्वर को भी धरती पर उतार दिया।

न शीत न ग्रीष्म। पूरा पावन काल। ऎसे समय में सूर्य की चमकती किरणों की साक्षी में चरित्र और धर्म धरती पर स्वयं *श्रीराम रूप धारण कर उतर आए*, श्रीराम का अवतार चैत्र शुक्ल नवमी को होता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि के ठीक नवे दिन भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था | आर्यसमाज की स्थापना इसी दिन हुई थी | यह दिन कल्प, सृष्टि, युगादि का प्रारंभिक दिन है | *संसारव्यापी निर्मलता और कोमलता के बीच प्रकट होता है हमारा अपना नया साल * *विक्रम संवत्सर* विक्रम संवत का संबंध हमारे कालचक्र से ही नहीं, बल्कि हमारे सुदीर्घ साहित्य और जीवन जीने की विविधता से भी है। राजा विक्रमादित्य ने इसी दिन से नववर्ष की स्थापना की थी ।

कहीं धूल-धक्कड़ नहीं, कुत्सित कीच नहीं, बाहर-भीतर जमीन-आसमान सर्वत्र स्नानोपरांत मन जैसी शुद्धता। पता नहीं किस महामना ऋषि ने चैत्र के इस दिव्य भाव को समझा होगा और किसान को सबसे ज्यादा सुहाती इस चैत मेे ही काल गणना की शुरूआत मानी होगी।

चैत्र मास का वैदिक नाम है-मधु मास। मधु मास अर्थात आनंद बांटती वसंत का मास। यह वसंत आ तो जाता है फाल्गुन में ही, पर पूरी तरह से व्यक्त होता है चैत्र में। सारी वनस्पति और सृष्टि प्रस्फुटित होती है , पके मीठे अन्न के दानों में, आम की मन को लुभाती खुशबू में, गणगौर पूजती कन्याओं और सुहागिन नारियों के हाथ की हरी-हरी दूब में तथा वसंतदूत कोयल की गूंजती स्वर लहरी में।

चारों ओर पकी फसल का दर्शन , आत्मबल और उत्साह को जन्म देता है। खेतों में हलचल, फसलों की कटाई , हंसिए का मंगलमय खर-खर करता स्वर और खेतों में डांट-डपट-मजाक करती आवाजें। जरा दृष्टि फैलाइए, भारत के आभा मंडल के चारों ओर। चैत्र क्या आया मानो खेतों में हंसी-खुशी की रौनक छा गई।

नई फसल घर मे आने का समय भी यही है | इस समय प्रकृति मे उष्णता बढ्ने लगती है , जिससे पेड़ -पौधे , जीव-जन्तु मे नव जीवन आ जाता है | लोग इतने मदमस्त हो जाते है कि आनंद में मंगलमय गीत गुनगुनाने लगते है | गौर और गणेश कि पूजा भी इसी दिन से तीन दिन तक राजस्थान मे कि जाती है | चैत शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के दिन सूर्योदय के समय जो वार होता है वह ही वर्ष में संवत्सर का राजा कहा जाता है , मेषार्क प्रवेश के दिन जो वार होता है वही संवत्सर का मंत्री होता है इस दिन सूर्य मेष राशि मे होता है |

चैत शुक्ल प्रतिपदा को नववर्ष मनाने का संकल्प ले | इस वर्ष १८ मार्च २०१८ रविवार को हिन्दू नववर्ष आ रहा है। पण्डित देव दत्त शर्मा की ओर से नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं

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तहसील साहू संघ पाटन पंहुचा महाकाल के दरबार : अश्वनी साहू

दुर्ग/ पतोरा – आज सुबह पतोरा के ग्रामवासी पहुचे महाकाल के दरबार में, जिसमे तहसील साहू संघ पाटन के अध्यछ अश्वनी साहू एवं सुदरसन साहू ‘ नरेश श्रीवास ‘कारण साहू ‘ मोहन साहू  नेतराम साहू  खोरबाहरा  धनंजय साहू  गगन साहू अनुराग साहू विनोद साहू ताकेस ठाकुर दिकविजे ठाकुर एवं महिला एवं बच्चो का 90 लोगो का काफिला सामिल है

इस वर्ष १८ मार्च २०१८ रविवार को हिन्दू नववर्ष आ रहा है। सभी तैयारी प्रारम्भ कर देवे । प्रेषक – अशोक लोहिया

१८ मार्च २०१८ को नववर्ष मनाये जाने के तर्कसंगत विषय को जन – जन तक पहुचाने में सहायक बने
नव संवत्सर २०७५ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा , १८ मार्च २०१८ से प्रारंभ हो रहा है। यही हमारा नया वर्ष है, इसे धूमधाम से मनाए –
हम बताते है भारतीय नववर्ष की विशेषता –
ग्रंथो में लिखा है कि जिस दिन सृष्टि का चक्र प्रथम बार विधाता ने प्रवर्तित किया, उस दिन चैत्र शुदी १ रविवार था। हमारे लिए आने वाला *संवत्सर २०७५* बहुत ही भाग्यशाली होगा , क़्योंकि इस वर्ष भी *चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को रविवार है, शुदी एवम ‘शुक्ल पक्ष एक ही है।

चैत्र के महीने के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि (प्रतिपद या प्रतिपदा) को सृष्टि का आरंभ हुआ था।हमारा *नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा* को शरू होता है| इस दिन ग्रह और नक्षत्र मे परिवर्तन होता है | हिन्दी महीने की शुरूआत इसी दिन से होती है |

पेड़-पोधों मे फूल ,मंजर ,कली इसी समय आना शुरू होते है , वातावरण मे एक नया उल्लास होता है जो मन को आह्लादित कर देता है | जीवो में धर्म के प्रति आस्था बढ़ जाती है | इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण किया था | भगवान विष्णु जी का प्रथम अवतार भी इसी दिन हुआ था | नवरात्र की शुरुअात इसी दिन से होती है | जिसमे हमलोग उपवास एवं पवित्र रह कर नव वर्ष की शुरूआत करते है |

परम पुरूष अपनी प्रकृति से मिलने जब आता है तो सदा चैत्र में ही आता है। इसीलिए सारी सृष्टि सबसे ज्यादा चैत्र में ही महक रही होती है। वैष्णव दर्शन में चैत्र मास भगवान नारायण का ही रूप है। चैत्र का आध्यात्मिक स्वरूप इतना उन्नत है कि इसने वैकुंठ में बसने वाले ईश्वर को भी धरती पर उतार दिया।

न शीत न ग्रीष्म। पूरा पावन काल। ऎसे समय में सूर्य की चमकती किरणों की साक्षी में चरित्र और धर्म धरती पर स्वयं श्रीराम रूप धारण कर उतर आए, श्रीराम का अवतार चैत्र शुक्ल नवमी को होता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि के ठीक नवे दिन भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था | आर्यसमाज की स्थापना इसी दिन हुई थी | यह दिन कल्प, सृष्टि, युगादि का प्रारंभिक दिन है | *संसारव्यापी निर्मलता और कोमलता के बीच प्रकट होता है हमारा अपना नया साल * *विक्रम संवत्सर* विक्रम संवत का संबंध हमारे कालचक्र से ही नहीं, बल्कि हमारे सुदीर्घ साहित्य और जीवन जीने की विविधता से भी है।

कहीं धूल-धक्कड़ नहीं, कुत्सित कीच नहीं, बाहर-भीतर जमीन-आसमान सर्वत्र स्नानोपरांत मन जैसी शुद्धता। पता नहीं किस महामना ऋषि ने चैत्र के इस दिव्य भाव को समझा होगा और किसान को सबसे ज्यादा सुहाती इस चैत मेे ही काल गणना की शुरूआत मानी होगी।

चैत्र मास का वैदिक नाम है-मधु मास। मधु मास अर्थात आनंद बांटती वसंत का मास। यह वसंत आ तो जाता है फाल्गुन में ही, पर पूरी तरह से व्यक्त होता है चैत्र में। सारी वनस्पति और सृष्टि प्रस्फुटित होती है , पके मीठे अन्न के दानों में, आम की मन को लुभाती खुशबू में, गणगौर पूजती कन्याओं और सुहागिन नारियों के हाथ की हरी-हरी दूब में तथा वसंतदूत कोयल की गूंजती स्वर लहरी में।

चारों ओर पकी फसल का दर्शन , आत्मबल और उत्साह को जन्म देता है। खेतों में हलचल, फसलों की कटाई , हंसिए का मंगलमय खर-खर करता स्वर और खेतों में डांट-डपट-मजाक करती आवाजें। जरा दृष्टि फैलाइए, भारत के आभा मंडल के चारों ओर। चैत्र क्या आया मानो खेतों में हंसी-खुशी की रौनक छा गई।

नई फसल घर मे आने का समय भी यही है | इस समय प्रकृति मे उष्णता बढ्ने लगती है , जिससे पेड़ -पौधे , जीव-जन्तु मे नव जीवन आ जाता है | लोग इतने मदमस्त हो जाते है कि आनंद में मंगलमय गीत गुनगुनाने लगते है | गौर और गणेश कि पूजा भी इसी दिन से तीन दिन तक राजस्थान मे कि जाती है | चैत शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के दिन सूर्योदय के समय जो वार होता है वह ही वर्ष में संवत्सर का राजा कहा जाता है , मेषार्क प्रवेश के दिन जो वार होता है वही संवत्सर का मंत्री होता है इस दिन सूर्य मेष राशि मे होता है |

जो भी व्यक्ति इस लेख से संतुष्ट है , इसे अधिक से अधिक लोगो के बीच शेयर करे और देश को बचाए | *चैत शुक्ल प्रतिपदा को नववर्ष मनाने का संकल्प ले | इस वर्ष १८ मार्च २०१८ रविवार को हिन्दू नववर्ष आ रहा है। सभी तैयारी प्रारम्भ कर देवे ।
प्रेषक –
अशोक लोहिया
(१) प्रांतीय अध्यक्ष ,
सरस्वती साहित्य प्रचार समिति छत्तीसगढ़
(२) कार्यपरिषद सदस्य , दुर्ग विश्वविद्यालय , दुर्ग
(३) प्रांतीय प्रचार मंत्री, छत्तीसगढ़ प्रांतीय अग्रवाल संगठन
(४) सचिव , श्री सत्यनारायण मंदिर समिति
(५) कोषाध्यक्ष , जिला ग्राम भारती
(६) कोषाध्यक्ष, श्री रामायण संघ
(७) प्रचार प्रभारी , श्री श्याम परिवार मित्र मंडल
(८) पूर्व मीडिया प्रभारी , जिला भारतीय जनता पार्टी राजनंदगांव

2 मार्च होली से आपके ग्रह गोचर में बदलाव आपको देंगे क्या फल जानिये राशिअनुशार

होली के दिन यानी 02 मार्च को शुक्रदेव अपनी चाल बदल रहे हैं। शुक्र का यह गोचर इन राशि का भाग्योदय करेगा ज्योतिषाचार्य अजित  शास्त्री के अनुसार, शुक्र ग्रह सुबह 11 बजकर 43 मिनट पर शुक्र मीन राशि में प्रवेश करेगा और 26 मार्च को दोपहर 03:47 तक वहीं पर रहेगा। शुक्र के मीन राशि में इस गोचर से विभिन्न राशि वालों पर अलग-अलग प्रभाव होगा।

मेष राशि- परिवार और संतान का सुख मिलेगा। साथ ही जीवनसाथी से सहयोग मिलेगा। इसके अलावा धन-समृद्धि की प्राप्ति होगी और रातों को आराम मिलेगा। परेशानियों को दूर करने के लिए गाय की सेवा करें।

वृष राशि- इस राशि के जातकों को धनलाभ हो सकता है। साथ ही परिवार में मतभेद भी हो सकते हैं। मन्दिर में इत्र का दान करें। इससे आपको फायदा होगा।

मिथुन राशि- इस राशि के जातक अगर सावधानी से नहीं चलेंगे तो वे किसी बड़ी मुसीबत में फंस सकते हैं। जीवनसाथी से प्रेम भाव बनाकर रखें तभी फायदा होगा। इसके लिए मंदिर में सफेद चीज का दान करें

कर्क राशि- आपके मनचाहे कार्य पूरे होंगे और 26 मार्च तक आपको पैसों की तंगी नहीं होगी। लेकिन मेहनत जारी रखें और व्यर्थ के कामों में पैसे खर्च करने से बचें नहीं तो पैसा गवां भी सतके हैं। इसके लिए आप शहद को घर के कोने में दबा दें।

सिंह राशि- किसी से कोई भी चीज़ उधार ना लें और दूसरों के झगड़ों में पड़ने से बचें। साथ ही इस बीच अपने जीवनसाथी की सेहत का ख्याल रखें। जीवनसाथी का स्वभाव आपके प्रति कुछ सख्त हो सकता है। मंदिर में जाकर अनाज का दान करें।

कन्या राशि- इन राशि वालों को पढ़ाई पर अधिक ध्यान देना होगा। लापरवाही बरतने पर आपको नुकसान झेलना पड़ सकता है। इसके लिए आप फूलों को मंदिर में चढ़ाएं।

तुला राशि- शुक्र के इस गोचर से आपको धन लाभ होगा। लेकिन सन्तान पक्ष से अधिक सुख की आशा न रखें। इस दिन महिलाएं गोल्डन रंग के कपड़े पहनें।

वृश्चिक राशि- धर्म के प्रति आपकी आस्था बढ़ेगी और परिवार के प्रति प्यार बढ़ेगा। लेकिन जीवन साथी से प्यार तभी मिलेगा जब आप पूरी तरह से वफादार होंगे। फायदे के लिए गरीबों में दूध का दान करें।

धनु राशि- आपको आर्थिक तंगी से मुक्ति मिलेगी और मस्तमौला लोगों से आपकी दोस्ती बढ़ेगी। कुएं में एक चुटकी हल्दी डाल दें, सारे कम बन जाएंगे।

मकर राशि- विपरित व्यवहार के लोगों के प्रति आकर्षण बढ़ेगा और अपनों से ज्यादा अन्य लोगों से आपको मदद मिलेगी। लेकिन ये लोग आपका काम बिगाड़ भी सकते हैं। इसलिए सावधान रहने की ज्यादा जरूरत होगी। इसके लिए आप बड़ों को खुश रखने की कोशिश करें।

कुंभ राशि-इससे आपके सम्मान में वृद्धि होगी। लेकिन परिवार का सहयोग नहीं मिलने से आप निराश होंगे। इसके लिए आप गाय की सेवा करें।

मीन राशि- आपको संतान का सुख मिलेगा।आपके लिए विवाह के प्रस्ताव आयेंगे परन्तु समय आपके लिए अनुकूल नही है क्योंकि आप 18 महीनों के बाद सरकारी कार्य का योग है जो पूरे नही हो सकेंगे 1का त्याग करना है। आपको धन, वाहन आदि का सुख मिलेगा। जीवन साथी का सहयोग करें तभी आपके काम बनेंगे