बैंकों में चल रहा है सेटिंग का खेल

करोड़ों की संपत्ति का लाखों में किया जा रहा है मूल्यांकन
भिलाई । एनपीए के बोझ तले चरमरा रहे बैंकों द्वारा वसूली प्रक्रिया को सख्त करने के चक्कर में कई गड़बडिय़ाँ की जा रही हैं। इसमें इतनी हड़बड़ी की जा रही है कि बड़ी-बड़ी गड़बडिय़ाँ हो रही हैं। ऐसे ही कुछ मामलों में पीडि़तों बैंक की कारगुजारियाँ उजागर की हैं। मामला भिलाई के व बालोद के एक राष्ट्रीयकृत बैंक से जुड़ा हुआ है। एक मामले में तो तीन महीने से भी कम समय में बैंक द्वारा जारी दो ई-नीलामी विज्ञापनों में एक ही सम्पत्ति की दो अलग-अलग आरक्षित मूल्यों का उल्लेख किया है । इनमें से एक संपत्ति बालोद तो दूसरी दुर्ग जिले में स्थित है।

पत्रकारवार्ता में धमतरी के राईस मिलर दिनेशचंद तिवारी, भिलाई के प्रमुख व्यवसायी चेतन टायर्स के संचालक दिलेश भाई कोटक व छोटू चावला ने संयुक्त रूप से इस आशय का आरोप लगाया । उन्होंने बताया कि, बैंक द्वारा 7 नवम्बर 2017 एवं 28 जनवरी 2018 को प्रकाशित ई-नीलामी में मेसर्स देवदत्ता पारबाइलिंग एवं मेसर्स हर्ष मिनी राइस मिल का आरक्षित मूल्य पहले 47.5 लाख रखा । इसके बाद मामले में पीडि़त द्वारा सवाल उठाए जाने पर बैंक ने दोबारा ई निलामी प्रक्रिया शुरू की जिसमें उसी प्रापर्टी का वेल्यू 119.10 लाख रुपए दर्शाया गया है। तीन महीने में ही संपत्तियों के मूल्य में दोगुने से अधिक का अंतर आ गया है। इसी तरह मेसर्स खुशी इंटरप्राइजेस का आरक्षित मूल्य 28 जनवरी 2018 को 38.47 लाख रुपए रखा गया । इस प्रापर्टी का तीन माह पहले 7 नवम्बर 2017 को इन आस्तियों का मूल्य बैंक ने 42.75 लाख रुपए निर्धारित किया था । यह मामला बैंक ऑफ बड़ौदा गुरुर शाखा से जुडा हुआ है । वहीं एक मामले में सुपेला के एक व्यापारी से बैंक ऑफ बड़ौदा सुपेला शाखा द्वारा ऐसी गड़बड़ी की गई कि, पांच साल पहले जिस प्रापटीज़् की वेल्यू एक करोड़ से ऊपर थी उसे नीलामी के समय 16 लाख रुपए में समेट दिया गया। पीडि़त ने मामाला डीआरटी जबलपुर में लगाया लेकिन उससे पहले ही बैंक ने प्रापर्टी की नीलामी प्रक्रिया शुरू कर दी ।

मामले में पीडि़त डिलीश चंद्र कोटक ने शनिवार को पत्रकार वार्ता में बताया कि, 2013 में उन्होंने 4 करोड़ रुपए का एक प्रोजेक्ट बनाया । जिसमें ग्राम बासीन में रबड़ इंडस्ट्रीज खोला जाना प्रस्तावित था । लोन के लिए बैंक ऑफ बड़ौदा की सुपेला शाखा में आवेदन लगाया। बैंक ने इसके लिए प्रापर्टी मॉडगेज करने कहा। इस दौरान बैंक ने सुपेला आकाश गंगा स्थित चेतन टायर्स का वेल्यूवेशन 1,21,12,500 रुपए किया। वहीं बैंक ने फैक्ट्री लैंड व एक अन्य प्रापर्टी के एवज में 2.70 करोड़ रुपए का लोन सेंक्शन किया था । लोन के एवज में बीमा कराने के नाम पर लिखित में आवेदन भी बैंक ने डिलीस चंद्र से लिया था । फैक्ट्री का काम शुरू होने व लगभग 90 फीसदी काम पूरा होने के बाद 29 मई को तेज आंधी तूफान के कारण निर्माण ढह गया । इसके बाद बैंक से बीमा क्लेम कर क्षतिपूर्ति दिलाने कहा गया तो बैंक ने बीमा न कराने की बात कह दी । अपनी गलती छिपाने के लिए बैंक द्वारा अतिरिक्त लोन सेंक्शन करने का भरोसा दिलाया। इस बार किसी तरह फैक्ट्री का काम पूरा कर प्रोडक्शन शुरू कर दिया। लेकिन बैंक ने वादे के मुताबिक अतिरिक्त लोन की राशि नहीं दी जिसके कारण लगातार हमारी पूंजी टूट रही थी। आखिरकार एक दिन बैंक ने हमारा खाता एनपीए में डाल दिया और वसूली का नोटिस भेज दिया। अब यहाँ पर बैंक की गड़बड़ी यह थी कि आकाश गंगा की जिस दुकान वेल्यूवेशन इन्होंने लोन जारी करते समय 1,21,12,500 रुपए किया था ऑक्सन के समय वह घटाकर 16 लाख रुपए कर दिया गया। डिलीश चंद्र का कहना है कि पांँच वर्षों में आकाशगंगा जैसे व्यापारिक स्थल पर प्रापर्टी की वेल्यू बढऩी चहिए न कि घटेगी। एक अन्य मामले में पीडि़त पक्ष राइस मिल संचालक धमतरी निवासी दिनेश चंद तिवारी ने बताया कि, वे सिस्टम का शिकार हो गए हैं। उन्होंने खादी ग्रामोद्योग विभाग की मदद से 2001 में राइस मिल का कारोबार शुरू किया था। कामकाज को देखते हुए बैंक ऑफ इंडिया रायपुर ने 2010.11 में एक करोड़ का ऋण दिया। 2012.13 में इस ऋण को बैंक ऑफ बड़ौदा बालोद शाखा ने टेक ओवर कर लिया। यहां से 1.8 करोड़ का ऋ ण स्वीकृत हुआ। वे समय पर किश्ते पटाते रहे। जुलाई 2015 में उनके राइस मिल को ब्लैक लिस्ट कर दिया गया। इसमें उनकी कोई गलती नहीं थी। जब इसकी शिकायत कलेक्टर के पास किया गया तो आठ माह बाद में उसे ब्लैक लिस्ट से निकाल भी दिया गया।
इस बीच वे किस्तें नहीं पटा पाए। बैंक ने पहले एनपीए घोषित किया और फिर संपत्ति की नीलामी का नोटिस भेज दिया। इस बीच उन्होंने डीआरटी में दस्तक दी जहाँ मामले की सुनवाई लंबित है। इससे पहले ही बैंक ने ई-नीलामी की प्रक्रिया शुरू कर दी।

अधिवक्ता एस.के.अग्रवाल ने बताया कि, राष्ट्रीयकृत बैंकों की माली हालत खराब है। रिजर्व बैंक ने वसूली प्रक्रिया में सख्ती के निर्देश दिए हैं। हितग्राहियों की मुसीबत यह है कि, वे मामले को सीधे हाईकोर्ट लेकर नहीं जा सकते। नियमानुसार मामलों को डीआरटी में सुलझाना है। डीआरटी आज भी जबलपुर में है। वहांँ पेंडिंग केसेस इतने हैं कि, वसूली की तारीख आने में ही दम निकल जाता है। डीआरटी का फैसला आने के बाद ही उसे हाई कोर्ट में चैलेंज किया जा सकता है। बैंक इसी बात का फायदा उठा रहे हैं।

शहर के एक बैंकर्स ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि, बैंक की ई.नीलामियाँ अकसर असफल हो जाती हैं। इसमें आस्तियों का मूल्य इतना रख दिया जाता है कि, कोई उसमें रुचि ही नहीं लेता। नीलामी को सफल करने के लिए कुछ बैंक रेट अंडरकोट करते हैं। आरक्षित मूल्य में अंतर का यह भी कारण हो सकता है।

मामले में बैंक ऑफ बड़ोदा सुपेला शाखा के प्रबंधक उदय सिंह का कहना है कि, वे इस मामले में सफाई देने के लिए अधिकृत नहीं हैं। वहीं उन्होंने कहा कि प्रापर्टी का वेल्यूवेशन बैंक नहीं करते बल्कि अधिकृत एजेंसियाँ करती है। जिस प्रापर्टी की बात कर रहे हैं उसका वेल्यूवेशन भी अधिकृत एजेंसियों ने किया है। इसमें यदि कोई भी शिकायत है तो पक्षकार स्वतंत्र है और इसके लिए डीआरटी बना हुआ है जहां वह शिकायत कर सकता है।